পিএমইন্ডিয়া
নয়াদিল্লি, ২১শে ফেব্রুয়ারি, ২০২৫
প্রধানমন্ত্রী শ্র্রী নরেন্দ্র মোদী আজ নয়া দিল্লির বিজ্ঞান ভবনে ৯৮তম অখিল ভারতীয় মারাঠি সাহিত্য সম্মেলনের উদ্বোধন করেন। অনুষ্ঠানে ভাষণ দিতে গিয়ে তিনি নয়া দিল্লিতে আয়োজিত এই মহোৎসবে উপস্থিত সকলকে আন্তরিক অভ্যর্থনা জানান। তিনি বলেন, অখিল ভারতীয় মারাঠি সাহিত্য সম্মেলন কেবলমাত্র একটি ভাষা বা একটি প্রদেশের মধ্যে সীমাবদ্ধ নয়। এই সম্মেলনে যেমন নিহিত আছে স্বাধীনতা সংগ্রামের মর্ম, তেমনি রয়েছে মহারাষ্ট্র তথা সমগ্র জাতির সাংস্কৃতিক ঐতিহ্য।
প্রধানমন্ত্রী উল্লেখ করেন, ১৮৭৮ সালে প্রথম সূচনার পর থেকে আজ অবধি অখিল ভারতীয় মারাঠি সাহিত্য সম্মেলন ভারতের ১৪৭ বছরের যাত্রাপথের সাক্ষী। তিনি স্মরণ করেন, মহাদেব গোবিন্দ রানাডে, হরিনারায়ণ আপ্তে, মধ্যশ্রীহরি আনে, শিবরাম পরাঞ্জপে এবং বীর সাভারকরের মতো মহামানবরা অতীতে এই সম্মেলনের সভাপতিত্ব করেছেন। শ্রী শরদ পওয়ারের আমন্ত্রণে এই গৌরবময় ঐতিহ্যের অংশ হতে পেরে তিনি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করেন এবং দেশ-বিদেশের সকল মারাঠি অনুরাগীদের অভিনন্দন জানান।
আন্তর্জাতিক মাতৃভাষা দিবসে এই সম্মেলনের আয়োজন প্রসঙ্গে প্রধানমন্ত্রী বলেন, মারাঠি ভাষার কথা ভাবলেই তাঁর মনে স্বতঃস্ফূর্তভাবে সন্ত জ্ঞানেশ্বরের শ্লোক ভেসে ওঠে। তিনি উল্লেখ করেন, জ্ঞানেশ্বর মহারাজ বলেছিলেন—“আমার মারাঠি ভাষার রস অমৃতকেও হার মানায়।” তাই মারাঠি ভাষা ও সংস্কৃতির প্রতি তাঁর ভালোবাসা অফুরন্ত। যদিও তিনি নিজেকে মারাঠি পণ্ডিতদের মতো দক্ষ মনে করেন না, তবুও তিনি সর্বদা নতুন মারাঠি শব্দ শেখার ও বলার আন্তরিক চেষ্টা চালিয়ে গেছেন।
প্রধানমন্ত্রী জানান, এই সম্মেলন একটি গুরুত্বপূর্ণ সময়ে অনুষ্ঠিত হচ্ছে—যখন দেশ ছত্রপতি শিবাজী মহারাজের অভিষেকের ৩৫০ বছর, পূণ্যশ্লোক অহল্যাবাই হোলকরের জন্মের ৩০০ বছর এবং বাবাসাহেব আম্বেদকরের সভাপতিত্বে রচিত ভারতের সংবিধানের ৭৫ বছর উদযাপন করছে। তিনি গর্ব করে বলেন, এক শতাব্দী আগে এক মহামান্য মারাঠি ব্যক্তিত্ব মহারাষ্ট্রের ভূমিতে রাষ্ট্রীয় স্বয়ংসেবক সংঘের বীজ বপন করেছিলেন, যা আজ এক বিশাল বৃক্ষে পরিণত হয়ে শতবর্ষ উদযাপন করছে। সংঘের প্রেরণায় দেশের জন্য জীবন উৎসর্গ করার সুযোগ পাওয়াকে তিনি নিজের সৌভাগ্য বলে উল্লেখ করেন। একইসঙ্গে তিনি জানান, কয়েক মাস আগেই মারাঠি ভাষাকে ‘ ধ্রুপদী ভাষা’র মর্যাদা দেওয়া হয়েছে, যা নিয়ে সারা বিশ্বের ১২ কোটিরও বেশি মারাঠি ভাষাভাষী বহু দশক ধরে অপেক্ষা করছিলেন। এই ঐতিহাসিক দায়িত্ব পালনের সুযোগ পেয়ে তিনি নিজেকে ধন্য মনে করেন।
তিনি বলেন—“ভাষা কেবল যোগাযোগের মাধ্যম নয়, ভাষাই আমাদের সংস্কৃতির বাহক।” সমাজে ভাষার জন্ম হলেও ভাষা সমাজগঠনেও সমান ভূমিকা পালন করে। মারাঠি ভাষা মহারাষ্ট্র ও দেশের অসংখ্য মানুষের চিন্তাধারাকে প্রকাশ করেছে এবং সাংস্কৃতিক উন্নতিতে অবদান রেখেছে। সমর্থ রামদাসজির বাণী উদ্ধৃত করে তিনি বলেন, “মারাঠি এক পূর্ণাঙ্গ ভাষা—যেখানে বীরত্ব, সৌন্দর্য, সংবেদনশীলতা, সাম্য, সাদৃশ্য, আধ্যাত্মিকতা এবং আধুনিকতার সমন্বয় রয়েছে।” তিনি যোগ করেন, মারাঠি ভাষায় ভক্তি, শক্তি ও যুক্তির সমন্বয় হয়েছে। ভারতের আধ্যাত্মিক শক্তির প্রয়োজন দেখা দিলে মহারাষ্ট্রের সাধকরা প্রাচীন ঋষিদের জ্ঞান মারাঠি ভাষায় মানুষের কাছে পৌঁছে দিয়েছেন।
প্রধানমন্ত্রী বলেন, শতাব্দীব্যাপী বিদেশি শাসনের সময় মারাঠি ভাষা স্বাধীনতার শঙ্খধ্বনি হয়ে উঠেছিল। শিবাজী মহারাজ, শম্ভাজী মহারাজ, বাজিরাও পেশোয়ার মতো যোদ্ধারা শত্রুদের ভয় ধরিয়ে দিয়েছিলেন। স্বাধীনতা সংগ্রামে ফড়কে, লোকমান্য তিলক ও বীর সাভারকর ব্রিটিশ শাসনকে চ্যালেঞ্জ করেছিলেন। তাঁদের সংগ্রামে মারাঠি ভাষা ও সাহিত্য ছিল শক্তির উৎস। ‘কেশরী’ ও ‘মারাঠা’ পত্রিকা, গোবিন্দরাজের কবিতা ও রামগণেশ গড়কারির নাটক জাতীয়তাবাদের আগুন জ্বালিয়ে দিয়েছিল। লোকমান্য তিলকের গীতা রহস্য, যা মারাঠিতে লেখা হয়েছিল, সমগ্র জাতিকে নতুন উদ্দীপনা জুগিয়েছিল।
তিনি আরও উল্লেখ করেন, মারাঠি সাহিত্য সমাজের শোষিত ও বঞ্চিত শ্রেণির মুক্তির দ্বার উন্মুক্ত করেছে। জ্যোতিবা ফুলে, সাবিত্রীবাই ফুলে, মহর্ষি কারভে ও বাবাসাহেব আম্বেদকরের মতো সমাজ সংস্কারকরা মারাঠি ভাষায় নতুন যুগের চিন্তাধারা লালন করেছেন। মারাঠি সাহিত্যে সমৃদ্ধ দলিত সাহিত্য যেমন রয়েছে, তেমনি আধুনিক বৈজ্ঞানিক দৃষ্টিভঙ্গির কারণে এখানে বিজ্ঞানের কথাসাহিত্যও বিকশিত হয়েছে।
তিনি বলেন, “সাহিত্য যেমন সমাজের আয়না, তেমনি সমাজের পথপ্রদর্শকও।” তাই সাহিত্য সম্মেলন এবং এ-জাতীয় প্রতিষ্ঠানসমূহ দেশের জন্য অপরিহার্য ভূমিকা পালন করে। তিনি আশা প্রকাশ করেন যে, আগামী ২০২৭ সালে ১৫০ বছর পূর্তি এবং শততম সম্মেলনকে মহৎ ও স্মরণীয় করে তুলতে প্রস্তুতি এখনই শুরু হবে। প্রধানমন্ত্রী তরুণ প্রজন্মকে সামাজিক মাধ্যমের মাধ্যমে মারাঠি সাহিত্য চর্চায় উৎসাহিত করার আহ্বান জানান। অনলাইন প্ল্যাটফর্ম ও ‘ভাষিণী’র মতো উদ্যোগ ব্যবহার করে মারাঠির প্রসার ঘটানো যেতে পারে বলেও তিনি উল্লেখ করেন।
তিনি আস্থা প্রকাশ করেন, মারাঠি সাহিত্যের প্রেরণা ও ঐতিহ্য ১৪০ কোটি ভারতবাসীকে বিকশিত ভারত নির্মাণে নতুন শক্তি, নতুন চেতনা ও নতুন অনুপ্রেরণা দেবে।
অনুষ্ঠানে মহারাষ্ট্রের মুখ্যমন্ত্রী দেবেন্দ্র ফড়ণবিস, রাজ্যসভার সদস্য শরদ পাওয়ার এবং ৯৮তম সম্মেলনের সভানেত্রী ড. তারা ভাওলকর উপস্থিত ছিলেন।
পটভূমি:
৯৮তম অখিল ভারতীয় মারাঠি সাহিত্য সম্মেলন ২১ থেকে ২৩ ফেব্রুয়ারি পর্যন্ত চলবে। এতে প্যানেল ডিসকাশন, বইমেলা, সাংস্কৃতিক অনুষ্ঠান, খ্যাতিমান সাহিত্যিকদের সঙ্গে মতবিনিময় ইত্যাদি অন্তর্ভুক্ত রয়েছে। দিল্লিতে ৭১ বছর পর এই সম্মেলন অনুষ্ঠিত হচ্ছে। বিশেষ আকর্ষণ হিসেবে আয়োজিত হয়েছে পুনে থেকে দিল্লি পর্যন্ত একটি প্রতীকী সাহিত্য যাত্রা, যেখানে প্রায় ১,২০০ জন অংশ নিচ্ছেন। সম্মেলনে ২,৬০০ কবিতা , ৫০টি বই প্রকাশনা ও ১০০টি স্টল থাকবে। দেশের বিভিন্ন প্রান্ত থেকে কবি, সাহিত্যিক, পণ্ডিত ও অনুরাগীরা এতে অংশগ্রহণ করবেন।
SC/TM
Addressing the 98th Akhil Bharatiya Marathi Sahitya Sammelan in New Delhi. https://t.co/AgVAi7GVGj
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हमारी भाषा हमारी संस्कृति की संवाहक होती है: PM @narendramodi pic.twitter.com/UwwMwurkyN
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मराठी एक सम्पूर्ण भाषा है। pic.twitter.com/ROhES7EjcX
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महाराष्ट्र के कितने ही संतों ने भक्ति आंदोलन के जरिए मराठी भाषा में समाज को नई दिशा दिखाई: PM @narendramodi pic.twitter.com/WttQQLtz83
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भारतीय भाषाओं में कभी कोई आपसी वैर नहीं रहा। pic.twitter.com/QeaFNFHQsd
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ये मेरे लिए अत्यंत गर्व की बात है कि मुझे नई दिल्ली में अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन में हिस्सा लेने का सौभाग्य मिला। pic.twitter.com/HXw6qtkj3g
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अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन देश की 147 वर्षों की यात्रा का साक्षी रहा है। मैं देश-दुनिया के सभी मराठी प्रेमियों को इस आयोजन की बधाई देता हूं। pic.twitter.com/S31Fxcaa2h
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मराठी एक संपूर्ण भाषा है। इसमें भक्ति भी है, शक्ति भी है और युक्ति भी है। pic.twitter.com/2a3IQmO5Iw
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मराठी भाषा और साहित्य ने समाज के शोषित-वंचित वर्ग के लिए सामाजिक मुक्ति के द्वार खोलने का भी अद्भुत काम किया है। pic.twitter.com/ApqGEVjV2g
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भारतीय भाषाओं में कभी कोई आपसी वैर नहीं रहा। इन्होंने हमेशा एक दूसरे को अपनाया है, एक दूसरे को समृद्ध किया है। pic.twitter.com/78BBWoNLyr
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आज इसलिए हम देश की सभी भाषाओं को Mainstream Language के रूप में देख रहे हैं… pic.twitter.com/5OF0Lm6bHT
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 वर्षों से भारत की महान परंपरा और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक संस्कार यज्ञ चला रहा है। pic.twitter.com/eJnAn7LgF9
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नवी दिल्ली इथे आयोजित अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलनात सहभागी होण्याचे भाग्य मला लाभले, ही माझ्यासाठी अभिमानाची बाब आहे. pic.twitter.com/RXk4M7UUbl
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अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलन देशाच्या 147 वर्षांच्या प्रवासाचे साक्षीदार आहे. मी देशातील तसेच जगभरातील सर्व मराठी प्रेमींचे या आयोजनानिमित्त अभिनंदन करतो. pic.twitter.com/Z9IkCZETli
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मराठी एक परिपूर्ण भाषा आहे. यात भक्ती ही आहे, शक्ती ही आहे आणि युक्ती देखील आहे. pic.twitter.com/MOpBScphvq
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मराठी भाषा आणि साहित्याने समाजाच्या शोषित-वंचित वर्गासाठी सामाजिक मुक्तीची दारे खुली करण्याचे अद्भुत कार्य केले आहे. pic.twitter.com/FoGtS6J1eu
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भारतीय भाषांमध्ये कुठल्याही प्रकारची परस्परांप्रती शत्रुत्वाची भावना नाही. त्यांनी नेहमीच एकमेकांचा आदर केला आहे , एकमेकांना समृद्ध केले आहे. pic.twitter.com/RxfWP3pgcB
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म्हणूनच आज आपण देशातील सर्व भाषांकडे मुख्य प्रवाहातील भाषा म्हणून पाहात आहोत pic.twitter.com/CFu5R8fliw
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