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प्रधानमंत्री ने संस्कृत में सुभाषितम् साझा करते हुए इस बात पर बल दिया है कि राष्ट्र की सेवा ही विकसित भारत की नींव है


प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने संस्कृत में सुभाषितम् साझा करते हुए इस बात पर बल दिया कि राष्ट्र की सेवा ही ‘विकसित भारत’ का आधार है। श्री मोदी ने सिविल सेवा दिवस के  गौरवशाली अवसर पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि आइए हम सबसे अंतिम व्यक्ति को विकास की मुख्यधारा में शामिल करके एक सशक्त, समृद्ध और संवेदनशील भारत के निर्माण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराएं।

प्रधानमंत्री ने संस्कृत में यह सुभाषितम् साझा किया-

“शीलं परहितसक्तिः अनुत्सेकः क्षमा धृतिः।”

अलोभश्चेति विद्यायाः परिपाकोञ्चलं फलम्॥”

इस सुभाषितम् में बताया गया है कि विनम्रता, परोपकार, विनय, क्षमा और धैर्य के साथ लोभ रहित होना, ये सभी ज्ञान की पूर्णता के उज्ज्वल फल हैं।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर पोस्ट किया:

“राष्ट्रसेवा ही ‘विकसित भारत’ की नींव है। सिविल सेवा दिवस के गौरवशाली अवसर पर आइए, अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को विकास की मुख्यधारा से जोड़कर सशक्त, समृद्ध एवं संवेदनशील भारतवर्ष के निर्माण का संकल्प दोहराएं।

 

शीलं परहितासक्तिः अनुत्सेकः क्षमा धृतिः।

अलोभश्चेति विद्यायाः परिपाकोञ्चलं फलम्॥”

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पीके/केसी/केके/ओपी