Search

पीएमइंडियापीएमइंडिया

न्यूज अपडेट्स

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत में पॉम ऑयल क्षेत्र और उत्पादन को बढ़ाने के उपायों को मंजूरी दी


प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत में पॉम ऑयल क्षेत्र और इसके उत्पादन को बढ़ाने के उपायों को मंजूरी दे दी है। इसमें शामिल हैं-

I. पॉम ऑयल की खेती के लिए एनएमओओपी (राष्ट्रीय तिलहन एवं पॉम ऑयल मिशन) के तहत भूमि सीलिंग सीमा में छूट।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एनएमओओपी के तहत कार्पोरेट निकायों को पॉम ऑयल की ओर आकर्षित करने और अधिकतम 100 प्रतिशत एफडीआई का लाभ प्राप्त करने के लिए 25 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सहायता प्रदान करने के लिए भी प्रतिबंधों में छूट दी।

II. एनएमओओपी के मिनी मिशन-II के तहत सहायता के नियमों में संशोधन।

मंत्रिमंडल ने सहायता के नियमों को संशोधित करने के लिए अपनी मंजूरी भी दी। इसमें मुख्य रूप से पॉम ऑयल वृक्षारोपण को आकर्षक बनाने के लिए रोपण सामग्री, रखरखाव लागत, अंतर-फसल लागत और बोर-वेल शामिल है।

इन उपायों से निम्नलिखित परिणाम प्राप्त होंगेः

कार्पोरेट निकायों द्वारा पॉम ऑयल वृक्षारोपण को बड़े पैमाने पर बढ़ावा और बंजर भूमि का इस्तेमाल। एनएमओओपी के तहत प्रतिबंधों में छूट देने से निजी उद्यमी/कार्पोरेट निकाय/संयुक्त उद्यम पॉम ऑयल वृक्षारोपण में निवेश में अपनी रूचि दिखाएंगे और एनएमओओपी की मदद का लाभ उठाएंगे।

बड़े पैमाने पर किसान पॉम ऑयल की खेती के लिए प्रोत्साहित होंगे। लागत मानदंडों में संशोधन किसानों को पॉम ऑयल वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित करेगा।

राज्य/एजेंसियों की वार्षिक कार्य योजना (एएपी) को संशोधित लागत मानदंडों पर कृषि, सहयोग और किसान कल्याण विभाग द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। निजी उद्यमी/कार्पोरेट निकाय/संयुक्त उद्यमों को संबंधित राज्यों द्वारा उनके राज्य में पॉम ऑयल के वृक्षारोपण के लिए आंत्रित किया जाएगा।

इस समय 12 राज्यो में इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इनमें, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, मिजोरम, ओडिशा, केरल, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और असम शामिल हैं। इन 12 राज्यों में करीब 133 जिलो में पॉम ऑयल की खेती हो रही है। हालांकि पॉम ऑयल संभावित सभी राज्य एनएमओओपी के तहत कवर हैं।

इस क्षेत्र में प्रतिबंधों में छूट देने और सब्सिडी के मानदंडों को ऊपर करने का कुछ वित्तीय असर पड़ सकता है लेकिन इनको भी एनएमओओपी फंड के अंदर शामिल कर लिया जाएगा। इसलिए, किसी भी अतिरिक्त फंड की आवश्यकता नहीं होगी।

12 वीं पंचवर्षीय योजना के लिए सालाना भौतिक और वित्तीय प्रगति नीचे वर्षवार दी गई हैः

लक्ष्य

 

उपलब्धि

 

जारी की गई आवंटित
राशि

 

2012-13

 

आईएसओपीओएम
एंड एंड ओपीएई
 

49932

 

26300

 

22705.74

 

6412.62

 

2013-14

 

आईएसओपीओएम
एंड एंड ओपीएई
  

41347

23183

 

19776.19

 

11849.09

 

2014-15

 

एनएमओओपी

 

28146

 

17143

 

7290.58

 

4112.47

 

2015-16

 

एनएमओओपी

 

27337

 

14425

 

6683.80

 

3823.49

 

2016-17*

 

एनएमओओपी

30061

 

9968

 

8038.68

 

4241.57

 

वर्ष
 
योजना
का नाम
पॉम ऑयल क्षेत्र
का विस्तार (हेक्टेयर)
 
राशि
(लाख रुपये में)
 

* दिसंबर 2016 तक

वर्तमान में, पॉम ऑयल विकास कार्यक्रम को किसान के निजी खेत में बढ़ावा दिया जा रहा है। बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के लिए निजी उद्यमियों/सहकारी निकायों/संयुक्त उद्यमों को सीधे निजी सहायता प्रदान करने की कोई गुंजाइश नहीं है। पॉम ऑयल की पैदावार करने वाले राज्यों में बंजर भूमि/निम्नीकृत भूमि/खेती योग्य भूमि को पट्टे/किराए पर दिया जा सकता है या निजी उदमियों/सहकारी निकायों/संयुक्त उद्यमों द्वारा पॉम ऑयल के पौधरोपण के लिए खरीदा जा सकता है। हालांकि एनएमओओपी के तहत 25 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए वित्तीय मदद की सुविधा उपलब्ध है। इसलिए, कॉर्पोरेट निकायों को पॉम ऑयल की तरफ आकर्षित करने के लिए एनएमओओपी के तहत प्रतिबंधों में छूट और 100 प्रतिशत की एफडीआई का अधिकतम लाभ दिए जाने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत खेती, अनुबंध खेती और वृक्षारोपण (सीलिंग भूमि के मानदंडों में राहत देकर) के मिश्रण से देश में केवल पॉम ऑयल की खेती को गति मिल सकती है।

विभिन्न हस्तक्षेपों (इंटरवेंशन) के लिए सहायता के मानदंडों को एनएमओईपी कार्यक्रम तैयार करने के दौरान प्रचलित कीमतों के आधार पर तय किया गया है। रोपण सामग्री की लागत, गड्ढों की खुदाई, रोपण, खनन, सिंचाई और चार साल तक बिना किसी आय के वृक्षारोपण का रखरखाव के लिए बड़े निवेश को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों ने पॉम ऑयल के वृक्षारोपण में अनिच्छा दिखाई है। इसके अलावा, पॉम ऑयल की अच्छी संभावना वाले उत्तर पूर्वी राज्यों को पहाड़ी इलाकों में जमीन को तैयार करने के लिए अतिरिक्त निवेश किए जाने की आवश्यकता है।

पृष्ठभूमिः

खाद्य तेल घरेलू भोजन का एक महत्वपूर्ण घटक है। देश भर में खाद्य तेलों का नौ मिलियन टन मीट्रिक कुल उत्पादन होता है, जबकि इसकी घरेलू जरूरत 25 मिलियन मीट्रिक टन के करीब है। मांग एवं आपूर्ति के बीच के इस फासले को आयात के जरिए पाटा जा सकता है, जिस पर 2015-16 (अनंतिम) में 68,000 करोड़ रुपये खर्च हुए। वनस्पति तेल के आयात में पॉम ऑयल की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत है और प्रति हेक्टेयर उत्पादकता के के कारण यह सबसे सस्ता तेल है।

पॉम ऑयल वनस्पति तेल की प्रति हेक्टेयर उपज के मामले में दुनिया की सबसे कुशल फसलों में से एक है। आज यह दुनिया में वनस्पति तेल का सबसे बड़ा स्रोत है। मलयेशिया, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड और कोलंबिया पॉम ऑयल का उत्पादन करने वाले बड़े देश हैं। पॉम ऑयल की औसत उपज 4-5 टन प्रति हेक्टेयर तक रिकार्ड की गई है जबकि सफेद सरसों की उपज 1.3 टन प्रति हेक्टेयर होती है।

भारत सरकार 1986-87 के बाद से और 2014-15 से एनएमओओपी के माध्यम से कई कार्यक्रमों को लागू करके पॉम ऑयल का प्रचार कर रही है। एनएमओओपी का उद्देश्य 2016-17 के अंत तक 1.25 लाख हेक्टेयर के अतिरिक्त क्षेत्र को पॉम ऑयल की खेती के तहत लाना है। विकास के इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप 1991-92 में 8585 हेक्टेयर का पॉम ऑयल का क्षेत्र 2015-16 के अंत तक बढ़कर करीब तीन लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया। इस तरह, ताजे फलों के गुच्छे (एफएफबी) और कच्चा पॉम ऑयल (सीपीओ) का उत्पादन क्रमशः 21,233 टन और 1,134 टन (1992-93) से बढ़कर 2014-15 के दौरान क्रमशः 11,50,000 टन और 1,98,000 टन पहुंच गया।