पीएमइंडिया
सियावर राम चंद्र की जय !
सियावर राम चंद्र की जय !
जय सियाराम !
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष पूज्य महंत नृत्य गोपाल दास जी, पूज्य संत समाज, यहां पधारे सभी भक्तगण, देश और दुनिया से इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बन रहे कोटि-कोटि रामभक्त, देवियों और सज्जनों !
आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष बिंदु की साक्षी बन रही है। आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व, राममय है। हर रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष है, असीम कृतज्ञता है, अपार अलौकिक आनंद है। सदियों के घाव भर रहे हैं, सदियों की वेदना आज विराम पा रही है, सदियों का संकल्प आज सिद्धि को प्राप्त हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्वलित रही। जो यज्ञ एक पल भी आस्था से डिगा नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटा नहीं। आज, भगवान श्री राम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा, श्री राम परिवार का दिव्य प्रताप, इस धर्म ध्वजा के रूप में, इस दिव्यतम, भव्यतम मंदिर में प्रतिष्ठापित हुआ है।
और साथियों,
ये धर्म ध्वजा केवल एक ध्वजा नहीं, ये भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है। इसका भगवा रंग, इस पर रचित सूर्यवंश की ख्याति, वर्णित ओम् शब्द और अंकित कोविदार वृक्ष रामराज्य की कीर्ति को प्रतिरूपित करता है। ये ध्वज संकल्प है, ये ध्वज सफलता है। ये ध्वज संघर्ष से सृजन की गाथा है, ये ध्वज सदियों से चले आ रहे स्वप्नों का साकार स्वरूप है। ये ध्वज संतों की साधना और समाज की सहभागिता की सार्थक परिणीति है।
साथियों,
आने वाली सदियों और सहस्र-शताब्दियों तक, ये धर्मध्वज प्रभु राम के आदर्शों और सिद्धांतों का उद्घोष करेगा। ये धर्मध्वज आह्वान करेगा- सत्यमेव जयते नानृतं! यानी, जीत सत्य की ही होती है, असत्य की नहीं। ये धर्मध्वज उद्घोष करेगा- सत्यम्-एकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः। अर्थात्, सत्य ही ब्रह्म का स्वरूप है, सत्य में ही धर्म स्थापित है। ये धर्मध्वज प्रेरणा बनेगा- प्राण जाए पर वचन न जाहीं। अर्थात्, जो कहा जाए, वही किया जाए। ये धर्मध्वज संदेश देगा- कर्म प्रधान विश्व रचि राखा! अर्थात्, विश्व में कर्म और कर्तव्य की प्रधानता हो। ये धर्मध्वज कामना करेगा- बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥ यानी, भेदभाव, पीड़ा-परेशानी से मुक्ति, समाज में शांति और सुख हो। ये धर्मध्वज हमें संकल्पित करेगा- नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। यानी, हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी न हो, कोई दुखी या लाचार न हो।
साथियों,
हमारे ग्रन्थों में कहा गया है- आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा, ये अभिनन्दन्ति धार्मिकाः। ते अपि सर्वे प्रमुच्यन्ते, महा पातक कोटिभिः॥ यानी, जो लोग किसी कारण मंदिर नहीं आ पाते, और दूर से मंदिर के ध्वज को प्रणाम कर लेते हैं, उन्हें भी उतना ही पुण्य मिल जाता है।
साथियों,
ये धर्मध्वज भी इस मंदिर के ध्येय का प्रतीक है। ये ध्वज दूर से ही रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराएगा। और, युगों-युगों तक प्रभु श्रीराम के आदेशों और प्रेरणाओं को मानव मात्र तक पहुंचाएगा।
साथियों,
मैं सम्पूर्ण विश्व के करोड़ों रामभक्तों को इस अविस्मरणीय क्षण की, इस अद्वितीय अवसर की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं आज उन सभी भक्तों को भी प्रणाम करता हूं, हर उस दानवीर का भी आभार व्यक्त करता हूं, जिसने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सहयोग दिया। मैं राम मंदिर के निर्माण से जुड़े हर श्रमवीर, हर कारीगर, हर योजनाकार, हर वास्तुकार, सभी का अभिनंदन करता हूं।
साथियों,
अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श, आचरण में बदलते हैं। यही वह नगरी है, जहाँ से श्रीराम ने अपना जीवन–पथ शुरू किया था। इसी अयोध्या ने संसार को बताया कि एक व्यक्ति कैसे समाज की शक्ति से, उसके संस्कारों से, पुरुषोत्तम बनता है। जब श्रीराम अयोध्या से वनवास को गए, तो वे युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे, तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर के आए। और उनके मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषादराज की मित्रता, मां शबरी की ममता, भक्त हनुमान का समर्पण, इन सबकी, अनगिनत ऐसे लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
साथियों,
विकसित भारत बनाने के लिए भी समाज की इसी सामूहिक शक्ति की आवश्यकता है। मुझे बहुत खुशी है कि राम मंदिर का ये दिव्य प्रांगण, भारत के सामूहिक सामर्थ्य की भी चेतना स्थली बन रहा है। यहां सप्तमंदिर बने हैं। यहां माता शबरी का मंदिर बना है, जो जनजातीय समाज के प्रेमभाव और आतिथ्य परंपरा की प्रतिमूर्ति हैं। यहां निषादराज का मंदिर बना है, ये उस मित्रता का साक्षी है, जो साधन नहीं, साध्य को, उसकी भावना को पूजती है। यहां एक ही स्थान पर माता अहिल्या हैं, महर्षि वाल्मीकी हैं, महर्षि वशिष्ठ हैं, महर्षि विश्वामित्र हैं, महर्षि अगस्त्य हैं, और संत तुलसीदास हैं। रामलला के साथ-साथ इन सभी ऋषियों के दर्शन भी यहीं पर होते हैं। यहां जटायु जी और गिलहरी की मूर्तियां भी हैं, जो बड़े संकल्पों की सिद्धि के लिए हर छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दिखाती हैं। मैं आज हर देशवासी से कहूंगा कि वो जब भी राम मंदिर आएं, तो सप्त मंदिर के दर्शन भी अवश्य करें। ये मंदिर हमारी आस्था के साथ-साथ, मित्रता, कर्तव्य और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को भी शक्ति देते हैं।
साथियों,
हम सब जानते हैं, हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं, मूल्य प्रिय हैं। उन्हें शक्ति नहीं, सहयोग महान लगता है। आज हम भी उसी भावना से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 वर्षों में, महिला, दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े, आदिवासी, वंचित, किसान, श्रमिक, युवा, हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है। जब देश का हर व्यक्ति, हर वर्ग, हर क्षेत्र सशक्त होगा, तब संकल्प की सिद्धि में सबका प्रयास लगेगा। और सबके प्रयास से ही 2047, जब देश आज़ादी के 100 साल मनाएगा, हमें 2047 तक विकसित भारत का निर्माण करना ही होगा।
साथियों,
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर, मैंने राम से राष्ट्र के संकल्प की चर्चा की थी। मैंने कहा था कि हमें आने वाले एक हज़ार वर्षों के लिए भारत की नींव मज़बूत करनी है। हमें याद रखना है, जो सिर्फ वर्तमान का सोचते हैं, वो आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करते हैं। हमें वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के बारे में भी सोचना है। क्योंकि, हम जब नहीं थे, ये देश तब भी था, जब हम नहीं रहेंगे, ये देश तब भी रहेगा। हम एक जीवंत समाज हैं, हमें दूरदृष्टि के साथ ही काम करना होगा। हमें आने वाले दशकों, आने वाली सदियों को ध्यान में रखना ही होगा।
और साथियों,
इसके लिए भी हमें प्रभु राम से सीखना होगा। हमें उनके व्यक्तित्व को समझना होगा, हमें उनके व्यवहार को आत्मसात करना होगा, हमें याद रखना होगा, राम यानी- आदर्श, राम यानी- मर्यादा, राम यानी- जीवन का सर्वोच्च चरित्र। राम यानी- सत्य और पराक्रम का संगम, “दिव्यगुणैः शक्रसमो रामः सत्यपराक्रमः।” राम यानी- धर्मपथ पर चलने वाला व्यक्तित्व, “रामः सत्पुरुषो लोके सत्यः सत्यपरायणः।” राम यानी- जनता के सुख को सर्वोपरि रखना, प्रजा सुखत्वे चंद्रस्य। राम यानी- धैर्य और क्षमा का दरिया “वसुधायाः क्षमागुणैः”। राम यानी- ज्ञान और विवेक की पराकाष्ठा, बुद्धया बृहस्पते: तुल्यः। राम यानी- कोमलता में दृढ़ता, “मृदुपूर्वं च भाषते”। राम यानी- कृतज्ञता का सर्वोच्च उदाहरण, “कदाचन नोपकारेण, कृतिनैकेन तुष्यति।” राम यानी- श्रेष्ठ संगति का चयन, शील वृद्धै: ज्ञान वृद्धै: वयो वृद्धै: च सज्जनैः। राम यानी- विनम्रता में महाबल, वीर्यवान्न च वीर्येण, महता स्वेन विस्मितः। राम यानी- सत्य का अडिग संकल्प, “न च अनृत कथो विद्वान्”। राम यानी- जागरूक, अनुशासित और निष्कपट मन, “निस्तन्द्रिः अप्रमत्तः च, स्व दोष पर दोष वित्।”
साथियों,
राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, राम एक मूल्य हैं, एक मर्यादा हैं, एक दिशा हैं। अगर भारत को साल 2047 तक विकसित बनाना है, अगर समाज को सामर्थ्यवान बनाना है, तो हमें अपने भीतर “राम” को जगाना होगा। हमें अपने भीतर के राम की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी, और इस संकल्प के लिए आज से बेहतर दिन और क्या हो सकता है?
साथियों,
25 नवंबर का ये ऐतिहासिक दिन अपनी विरासत पर गर्व का एक और अद्भुत क्षण लेकर आया है। इसकी वजह है, धर्मधव्जा पर अंकित- कोविदार वृक्ष। ये कोविदार वृक्ष इस बात का उदाहरण है कि जब हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं, तो हमारा वैभव इतिहास के पन्नों में दब जाता है।
साथियों,
जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे, तो लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। ये कैसे हुआ, इसका वर्णन वाल्मीकि जी ने किया है, और वाल्मीकि जी ने क्या वर्णन किया है, उन्होंने कहा है – विराजति उद्गत स्कन्धम्, कोविदार ध्वजः रथे।। लक्ष्मण कहते हैं— “हे राम, सामने जो तेजस्वी प्रकाश में विशाल वृक्ष जैसा ध्वज दिखाई दे रहा है, वही अयोध्या की सेना का ध्वज है, उस पर कोविदार का शुभ चिह्न अंकित है।”
साथियों,
आज जब राम मंदिर के प्रांगण में कोविदार फिर से प्रतिष्ठित हो रहा है, यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है, यह हमारी स्मृति की वापसी है, हमारी अस्मिता का पुनर्जागरण है, हमारी स्वाभिमानी सभ्यता का पुनः उद्घोष है। कोविदार वृक्ष हमें याद दिलाता है कि जब हम अपनी पहचान भूलते हैं, तो हम स्वयं को खो देते हैं। और जब पहचान लौटती है, तो राष्ट्र का आत्मविश्वास भी लौट आता है। और इसलिए मैं कहता हूं, देश को आगे बढ़ना है, तो अपनी विरासत पर गर्व करना होगा।
साथियों,
अपनी विरासत पर गर्व के साथ-साथ, एक और बात भी महत्वपूर्ण है, और वो है- गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति। आज से 190 साल पहले, 190 साल पहले, साल 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज़ ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। दस साल बाद, यानि 2035 में उस अपवित्र घटना को 200 वर्ष पूरे हो रहे हैं। कुछ दिन पहले ही मैंने एक कार्यक्रम में आग्रह किया था कि हमें आने वाले दस वर्षों तक, उस दस वर्षों का लक्ष्य लेकर चलना है कि भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करके रहेंगे।
साथियों,
सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मैकाले ने जो कुछ सोचा था, उसका प्रभाव कहीं व्यापक हुआ। हमें आज़ादी मिली, लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं मिली। हमारे यहां एक विकार आ गया कि विदेश की हर चीज़, हर व्यवस्था अच्छी है, और जो हमारी अपनी चीजें हैं, उनमें खोट ही खोट है।
साथियों,
गुलामी की यही मानसिकता है, जिसने लगातार ये स्थापित किया, हमने विदेशों से लोकतंत्र लिया, कहा गया कि हमारा संविधान भी विदेश से प्रेरित है, जबकि सच ये है कि भारत लोकतंत्र की जननी है, Mother of Democracy है, लोकतंत्र हमारे DNA में है।
साथियों,
अगर आप तमिलनाडु जाएंगे, तो तमिलनाडु के उत्तरी हिस्से में उत्तिरमेरूर गांव है। वहां हज़ारों वर्ष पहले का एक शिलालेख है। उसमें बताया गया है कि उस कालखंड में भी कैसे लोकतांत्रिक तरीके से शासन व्यवस्था चलती थी, लोग कैसे सरकार चुनते थे। लेकिन हमारे यहां तो मैग्ना कार्टा की प्रशंसा का ही चलन रहा। हमारे यहां भगवान बसवन्ना, उनके अनुभव मंटपा की जानकारी भी सीमित रखी गई। अनुभव मंटपा यानि, जहां सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विषयों पर सार्वजनिक बहस होती थी। जहां सामूहिक सहमति से निर्णय लिए जाते थे। लेकिन गुलामी की मानसिकता के कारण, इस भारत की कितनी ही पीढ़ियों को इस जानकारी से भी वंचित रखा गया।
साथियों,
हमारी व्यवस्था के हर कोने में गुलामी की इस मानसिकता ने डेरा डाला हुआ था। आप याद करिए, भारतीय नौसेना का ध्वज, सदियों तक उस ध्वज पर ऐसे प्रतीक बने रहे, जिनका हमारी सभ्यता, हमारी शक्ति, हमारी विरासत से कोई संबंध नहीं था। अब हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी के हर प्रतीक को हटाया है। हमने छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित किया है। और ये सिर्फ एक डिजाइन में बदलाव नहीं हुआ, ये मानसिकता बदलने का क्षण था। ये वो घोषणा थी कि भारत अब अपनी शक्ति, अपने प्रतीकों से परिभाषित करेगा, न कि किसी और की विरासत से।
और साथियों,
यही परिवर्तन आज अयोध्या में भी दिख रहा है।
साथियों,
ये गुलामी की मानसिकता ही है, जिसने इतने वर्षों तक रामत्व को नकारा है। भगवान राम, अपने आप में एक वैल्यू सिस्टम हैं। ओरछा के राजा राम से लेकर, रामेश्वरम के भक्त राम तक, और शबरी के प्रभु राम से लेकर, मिथिला के पाहुन राम जी तक, भारत के हर घर में, हर भारतीय के मन में, और भारतवर्ष के हर कण-कण में राम हैं। लेकिन गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई कि प्रभु राम को भी काल्पनिक घोषित किया जाने लगा।
साथियों,
अगर हम ठान लें, अगले दस साल में मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्ति पा लेंगे, और तब जाकर के, तब जाकर के ऐसी ज्वाला प्रज्जवलित होगी, ऐसा आत्मविश्वास बढ़ेगा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा होने से भारत को कोई रोक नहीं पाएगा। आने वाले एक हज़ार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी सशक्त होगी, जब मैकाले की गुलामी के प्रोजेक्ट को हम अगले 10 साल में पूरी तरह ध्वस्त करके दिखा देंगे।
साथियों,
अयोध्या धाम में रामलला का मंदिर परिसर भव्य से भव्यतम हो रहा है, और साथ ही अयोध्या को संवारने का काम लगातार जारी है। आज अयोध्या फिर से वह नगरी बन रही है, जो दुनिया के लिए उदाहरण बनेगी। त्रेता युग की अयोध्या ने मानवता को नीति दी, 21वीं सदी की अयोध्या मानवता को विकास का नया मॉडल दे रही है। तब अयोध्या मर्यादा का केंद्र थी, अब अयोध्या विकसित भारत का मेरुदंड बनकर उभर रही है।
साथियों,
भविष्य की अयोध्या में पौराणिकता और नूतनता का संगम होगा। सरयू जी की अमृत धारा और विकास की धारा, एक साथ बहेंगी। यहां आध्यात्म और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, दोनों का तालमेल दिखेगा। राम पथ, भक्ति पथ और जन्मभूमि पथ से नई अयोध्या के दर्शन होते हैं। अयोध्या में भव्य एयरपोर्ट है, अयोध्या में आज शानदार रेलवे स्टेशन है। वंदे भारत और अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें अयोध्या को बाकी देश से जोड़ रही हैं। अयोध्या वासियों को सुविधाएं मिलें, उनके जीवन में समृद्धि आए, इसके लिए निरंतर काम चल रहा है।
साथियों,
जब से प्राण प्रतिष्ठा हुई है, तब से लेकर आज तक करीब-करीब पैंतालीस करोड़ श्रद्धालु, यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं। ये वो पवित्र भूमि है, जहां पैंतालीस करोड़ लोगों के चरण रज पड़े हैं। और इससे अयोध्या और आसपास के लोगों की आय में आर्थिक परिवर्तन आया है, वृद्धि हुई है। कभी अयोध्या विकास के पैमानों में बहुत पीछे थी, आज अयोध्या नगरी यूपी के अग्रणी शहरों में से एक बन रही है।
साथियों,
21वीं सदी का आने वाला समय बहुत महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद के 70 साल में भारत, 70 साल में भारत विश्व की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना, 70 साल में 11वीं। लेकिन पिछले 11 साल में ही भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। और वो दिन दूर नहीं, जब भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन जाएगा। आने वाला समय नए अवसरों का है, नई संभावनाओं का है। और इस अहम कालखंड में भी भगवान राम के विचार ही हमारी प्रेरणा बनेंगे। जब श्रीराम के सामने रावण विजय जैसा विशाल लक्ष्य था, तब उन्होंने कहा था- सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। यानि, रावण पर विजय पाने के लिए जो रथ चाहिए, शौर्य और धैर्य उसके पहिए हैं। उसकी ध्वजा सत्य और अच्छे आचरण की है। बल, विवेक, संयम और परोपकार इस रथ के घोड़े हैं। लगाम के रूप में क्षमा, दया और समता हैं, जो रथ को सही दिशा में रखते हैं।
साथियों,
विकसित भारत की यात्रा को गति देने के लिए ऐसा ही रथ चाहिए, ऐसा रथ जिसके पहिए शौर्य और धैर्य हों। यानि चुनौतियों से टकराने का साहस भी हो, और परिणाम आने तक दृढ़ता से डटे रहने का धैर्य भी हो। ऐसा रथ, जिसकी ध्वजा सत्य और सर्वोच्च आचरण हो, यानि नीति, नीयत और नैतिकता से समझौता कभी न हो। ऐसा रथ, जिसके घोड़े बल, विवेक, संयम और परोपकार हों, यानि शक्ति भी हो, बुद्धि भी हो, अनुशासन भी हो और दूसरों के हित का भाव भी हो। ऐसा रथ, जिसकी लगाम क्षमा, करुणा और समभाव हो, यानि जहां सफलता का अहंकार नहीं, और असफलता में भी दूसरों के प्रति सम्मान बना रहे। और इसलिए मैं आदरपूर्वक कहता हूँ, ये पल कंधे से कंधा मिलाने का है, ये पल गति बढ़ाने का है। हमें वो भारत बनाना है, जो रामराज्य से प्रेरित हो। और ये तभी संभव है, जब स्वयंहित से पहले, देशहित होगा। जब राष्ट्रहित सर्वोपरि रहेगा। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।
जय सियाराम !
जय सियाराम !
जय सियाराम !
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MJPS/VJ/AK/RK
आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष-बिंदु की साक्षी बन रही है। श्री राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर ध्वजारोहण उत्सव का यह क्षण अद्वितीय और अलौकिक है। सियावर रामचंद्र की जय! https://t.co/4PPt0rEnZy
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आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व…राममय है: PM @narendramodi pic.twitter.com/NaWcE8NAED
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ये धर्म ध्वजा केवल एक ध्वज नहीं… ये भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है: PM @narendramodi pic.twitter.com/3sI3HsusQe
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अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श...आचरण में बदलते हैं: PM @narendramodi pic.twitter.com/elzUvALvUr
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राम मंदिर का ये दिव्य प्रांगण... भारत के सामूहिक सामर्थ्य की भी चेतना स्थली बन रहा है: PM @narendramodi pic.twitter.com/mWvkzabhki
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हमारे राम...भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं: PM @narendramodi pic.twitter.com/d1TdWQEYee
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हम एक जीवंत समाज हैं... हमें दूरदृष्टि के साथ ही काम करना होगा...
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हमें आने वाले दशकों, आने वाली सदियों को ध्यान में रखना ही होगा: PM @narendramodi pic.twitter.com/UWtTRWAEfv
राम यानी आदर्श, राम यानी मर्यादा, राम यानी जीवन का सर्वोच्च चरित्र। pic.twitter.com/OtgvIBIOi8
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राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं... राम एक मूल्य हैं, एक मर्यादा हैं, एक दिशा हैं। pic.twitter.com/srviB91AME
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अगर भारत को साल 2047 तक विकसित बनाना है… अगर समाज को सामर्थ्यवान बनाना है…
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तो हमें अपने भीतर “राम” को जगाना होगा: PM @narendramodi pic.twitter.com/BvDFjwN92l
देश को आगे बढ़ना है तो अपनी विरासत पर गर्व करना होगा: PM @narendramodi pic.twitter.com/BxfDP129pE
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हमें आने वाले दस वर्षों का लक्ष्य लेकर चलना है कि हम भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करके रहेंगे: PM @narendramodi pic.twitter.com/MclchQMORs
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भारत...लोकतंत्र की जननी है... लोकतंत्र हमारे DNA में है: PM @narendramodi pic.twitter.com/2GdyoGnqVP
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विकसित भारत की यात्रा को गति देने के लिए ऐसा रथ चाहिए... pic.twitter.com/Oz81LjdNc5
— PMO India (@PMOIndia) November 25, 2025
आज अयोध्या में रामलला मंदिर के ध्वजारोहण अनुष्ठान से पूर्व मंदिर परिसर में सप्त मंदिरों के दर्शन कर आशीर्वाद लेने का सौभाग्य भी मिला। महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज एवं माता शबरी के सप्त मंदिरों से वह बोध एवं भक्ति… pic.twitter.com/SkyS8BmYXD
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
सप्त मंदिरों के सभी सात ऋषियों एवं महा भागवतों की उपस्थिति से ही रामचरित पूर्ण होता है। महर्षि वशिष्ठ एवं महर्षि विश्वामित्र ने प्रभु रामलला के विद्याध्ययन की लीला पूरी कराई। महर्षि अगस्त्य से वन गमन के समय ज्ञान चर्चाएं हुईं एवं राक्षसी आतंक के विनाश का मार्ग प्रशस्त हुआ। आदिकवि… pic.twitter.com/m1Fl5WwBQ4
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
Today, before the Dharma Dhwajarohan Utsav at the Shri Ram Janmabhoomi Mandir in Ayodhya, I was blessed with the opportunity to pray and seek blessings at the Sapt Mandir complex within the temple premises. pic.twitter.com/9lZ1cdXlgw
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
These seven sacred shrines, dedicated to Maharishi Vashishtha, Maharishi Vishwamitra, Maharishi Agastya, Maharishi Valmiki, Devi Ahalya, Nishadraj and Mata Shabari offer us both wisdom and devotion. It is this divine grace that helps us become worthy of following the ideals of… pic.twitter.com/eXuQ8sb9K9
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
अयोध्या के पावन धाम में श्री राम जन्मभूमि मंदिर में ध्वजारोहण समारोह का हिस्सा बनना मेरे लिए अत्यंत भावविभोर करने वाला अनुभव रहा। शुभ मुहूर्त में संपन्न हुआ यह अनुष्ठान हमारे सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रीय एकता के नए अध्याय का उद्घोष है। राम मंदिर का गौरवशाली ध्वज, विकसित भारत के… pic.twitter.com/1uwYN2NXHW
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
To witness the Dharma Dhwajarohan Utsav at Shri Ram Janmabhoomi Mandir is a moment crores of people in India and the world have waited for. History has been made in Ayodhya and this inspires us even more to walk the path shown by Prabhu Shri Ram. pic.twitter.com/3K9j6CQS68
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
आज अयोध्या में माता अन्नपूर्णा मंदिर में पूजा-अर्चना का सौभाग्य प्राप्त हुआ। देवी मां से समस्त देशवासियों के उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की। माता अन्नपूर्णा अन्न, आनंद और अभय की अधिष्ठात्री देवी हैं। मेरी प्रार्थना है कि उनका आशीर्वाद, विकसित भारत के हर प्रयास को यश और… pic.twitter.com/11Q1ofjRE7
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
अलौकिक श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्री राम परिवार के दर्शन का सुअवसर मिला। यह क्षण श्रद्धा और भक्ति से भावविभोर कर गया। प्रभु श्री राम, माता जानकी, शेषावतार लक्ष्मण जी और सकल परिवार का दिव्य ये स्वरूप, भारत की चेतना की साक्षात प्रतिमूर्ति सा है। ये असंख्य रामभक्तों की तपस्या का… pic.twitter.com/HV2TKciM04
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
अयोध्या की पावन भूमि पर दिव्य-भव्य श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्री राम लला के दर्शन-पूजन का अलौकिक क्षण मन को अद्भुत आनंद से भर गया। रामलला की ये बाल प्रतिमा, भारत की चेतना का जागृत स्वरूप है। हर बार रामलला का ये दिव्यतम विग्रह, मुझे एक असीम ऊर्जा देने का माध्यम बनता है। ये… pic.twitter.com/AUj3mHdfdT
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श्री राम लला मंदिर के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा और उनका दिव्य प्रताप धर्म ध्वजा के रूप में दिव्यतम-भव्यतम श्री राम जन्मभूमि मंदिर में प्रतिष्ठापित हुआ है। ये धर्म ध्वजा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक है। pic.twitter.com/MO4YMod4Su
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मुझे बहुत खुशी है कि राम मंदिर का दिव्य प्रांगण भारत के सामूहिक सामर्थ्य की चेतना स्थली बन रहा है। हर देशवासी से मेरा आग्रह है कि वे यहां सप्तमंदिर के दर्शन अवश्य करें, जो हमारी आस्था के साथ-साथ मित्रता, कर्तव्य और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को दर्शाता है। pic.twitter.com/gTio9Vsf7o
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राम एक मूल्य हैं, एक मर्यादा हैं, एक दिशा हैं। भारत को 2047 तक विकसित और समाज को सामर्थ्यवान बनाने के लिए हमें अपने भीतर के राम की प्राण-प्रतिष्ठा करनी होगी। pic.twitter.com/OCof5lUyx6
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मैं इसलिए कहता हूं कि हमारे देश को आगे बढ़ना है तो हमें अपनी विरासत पर गर्व करना होगा… pic.twitter.com/ZzQsmZ0pSU
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
भारत के हर घर में, हर भारतीय के मन में और भारतवर्ष के हर कण में राम हैं। लेकिन गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई कि प्रभु राम को भी काल्पनिक घोषित किया जाने लगा। pic.twitter.com/x8uEZ37r5N
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025
हमें वैसा भारत बनाना है, जो रामराज्य से प्रेरित हो। ये तभी संभव है, जब स्वयंहित से पहले देशहित हो और राष्ट्रहित सर्वोपरि हो। pic.twitter.com/lVGgOWWJ0A
— Narendra Modi (@narendramodi) November 25, 2025