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गन्ना मूल्य श्रृंखला पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री का संबोधन

गन्ना मूल्य श्रृंखला पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री का संबोधन


विशाल संख्या में पधारे हुए किसान भाइयों-बहनों, सहकारी क्षेत्र के सभी महानुभाव,

मैं सबसे पहले बसंतदादा पाटील की जन्मशति के शुभारंभ पर उनको आदरपूरवर्क अंजली देता हूं। सार्वजनिक जीवन में जिन उच्च मूल्यों की उन्होंने प्रस्थापना की। लेकिन साथ-साथ अपने जीवन को किसान के साथ, cooperative के साथ और उसमें भी आधुनिकता की तरफ निरंतर चलते रहना उसमें उनका बहुत बड़ा योगदान रहा और आज इस संस्था की जो मजबूत नींव देख रहे हैं उसके मूल में बसंतदादा पाटील जी की दीर्घदृष्टि, उनका योगदान और भारत की जो अर्थकारक की जो मूल धारा है, गांव और किसान से जुड़ी रहती है। उसको भली भांति पहचान कर के उसको ताकत देने का निरंतर प्रयास Even आने वाली पीढ़ियों को भी उपकारक होने वाला है।

हमारे देश में जिस गति से कृषि क्षेत्र में अनुसंधान होने चाहिए थे। technology का उपयोग बढ़ना चाहिए था। दुनिया जिस गति से आगे बढ़ी है। उसमें हम काफी पीछे रह गये हैं। आज भी विश्व में प्रति एकड़ जो sugarcane का yield है, पैदावार है उसकी तुलना में हम काफी पीछे हैं। आज भी दुनिया में शुगरकेन में जो sugar content है, हमारे देश में आज भी उसमें variations है। दक्षिण में एक अनुभव आता है, मध्य में दूसरा आता है, उत्तर में तीसरा आता है। और ऐसे समय एक dedicated institution जो निरंतर वैज्ञानिकों को साथ लेकर के technology का भरपूर उपयोग करते हुए और किसान जिस भाषा में समझे उस भाषा में खेत तक पहुंचाने का जो प्रयास कर रही है। मैं नहीं मानता हूं कि ये कोई छोटा सा काम है और इसका परिणाम हम अनुभव करते हैं। आज मैं शरद राव जी के साथ farm visit भी की मैंने सारी चीजों को समझने का प्रयास किया। मेरी भी इन चीजों में थोड़ी जिज्ञासा रहती है। मैं कभी परेशान होता था कि sugar में जो flood irrigation होता है। और किसान के दिमाग में भर गया था कि जब तक खेत लबालब पानी से भरा हुआ नहीं होगा। तब तक फसल हो ही नहीं सकती।

मैं बहुत साल पहले Mauritius गया, इन चीजों को समझने के लिए तब तो मैं राजनीतिक जीवन में नहीं था। और मैंने वहां पाया कि sprinkler से उनके खेत लहलहा रहे थे। flood irrigation नहीं था। मैंने आकर के मेरे यहां जब किसानों से बात की, तो मैं उनके गले नहीं उतार पाया। ये बहुत पुरानी बात है। उस समय मैं उनको समझा रहा था। उनको जरा अजूबा लगता था कि इसको क्या समझ आती होगी। लेकिन मैं कोशिश करता था कि भाई ऐसा नहीं है। हम micro-irrigation से sugarcane में बहुत अच्छे परिणाम ला सकते हैं। और इन दिनों मेरे लिए खुशी की बात है कि पानी का जैसा हम संकट अनुभव कर रहे हैं। और विशेषकर के महाराष्ट्र और गुजरात। यहां का किसान बहुत तेजी से sugar में micro-irrigation की तरफ आगे बढ़ा है। और उसका फायदा भी उसको नजर आया है। जहां पर micro irrigation से sugar cultivation हुआ। वहां पर crop, crop की quality, crop का quantum और उसमें sugar का content इस स्तर पर सुधार नजर आया है। और इसलिये धीरे-धीरे sugar industries वालों को भी लगने लगा है कि अगर हम micro irrigation की ओर उनको प्रोत्साहन देंगे, तो अवश्य लाभ होगा।

यहां जो research institution चल रही है। दो चीजें हैं जिसपर अगर हम काम कर सकें। मैंने सरकार के इन विभागों के साथ पहले एक बार बात की थी। दुनिया में जो शुगर है उसकी जो दो गांठ है। उस दो गांठ के बीच में अंतर ज्यादा होता है। हमारे यहां जो शुगर है, उसकी दो गांठ के बीच में अंतर कम होता है। और उसके कारण हमारा sugar content में loss जाता है। wastage material ज्यादा निकलता है। हमें genetic intervention से हमारे sugarcane के ये जो गांठ होती है। ये इसका distance कैसे बढ़े अगर ये बढ़ता है, तो हमारा sugar content बढ़ेगा। और उसके कारण जो water consumption है वो भी कम उसकी आदत लगती है क्योंकि गांठ के कारण उसको grow करने में ज्यादा ताकत लगती है। अगर इस पर हम ज्यादा research कर पाएं। लेकिन करते तो हम sugar के लिए हैं। ये institution भी शुगर के लिए dedicated है। लेकिन एक और क्षेत्र है। जिसमें अगर शरद राव जी initiative लें और यहां के scientist कुछ काम करें, और दोनों एक ही nature के काम हैं और वो है bamboo. Bamboo की खेती का एक global market है। लेकिन हमारे देश का जो bamboo है, उस bamboo का भी problem यह है कि उसका भी जो दो गांठ के बीच का जो अंतर है वो बहुत कम है। और उसके कारण bamboo से value addition जो bi-product होते हैं। उसमें हमारे किसान को जितना चाहिए उतना फायदा नहीं होता है। Bamboo की खेती पानी की भी जरूरत कम और पैदावार ज्यादा की संभावना है। जिस genetic intervention से हम sugar में बदलाव ला सकते हैं मेरा मोटा-मोटा अनुमान है मैं scientist नहीं हूं। scientist लोग इसमें ज्यादा मदद कर सकते हैं। Bamboo में भी यही research simultaneous से यहां अगर चल सकती है। और हम globally competitive bamboo quality अगर हम लाते हैं, तो हमारे देश में एक नया क्षेत्र aggro-economy का हम प्रारम्भ कर सकते हैं। उस दिशा में करने की दिशा में सोचा जा सकता है।

दूसरा जो विषय है। जमीन कम होती जा रही है। किसान का परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी बच्चों में जमीन के टुकड़े बंटते चले जा रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण भी जमीन कृषि की कम होना और बाकि उपयोग में बढ़ना स्वाभाविक होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में किसान का भला तब होगा, जब हम प्रति हैक्टर हमारी उत्पादन क्षमता को बढ़ाएं। प्रति हैक्टेयर उत्पादन क्षमता भांति – भांति fertilizer का ढेर करने से होता है ऐसा नहीं है। वैज्ञानिक तरीके से संतुलित उपयोग करने से ही होता है। खुशी की बात है कि पहले sugar का किसान इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि हम दो sugarcane की लाइन के बीच में भी कोई तीसरा crop कर सकते हैं। अब खुशी की बात है कि खासकर के pulses तूर दाल के लिए मूंग के लिए किसान अब sugarcane के बीच में भी धीरे – धीरे खेती करना प्रारंभ किया है। और जिन्होंने drip irrigation या sprinkler का उपयोग किया है। उनके लिये बहुत सरलता हुई है। एक प्रकार से bi-product है। sugar से जो आपको income मिलती थी वो तो मिलती है ये बीच वाली जगह जो पड़ी थी। उसमें ये अतिरिक्त crop करने के कारण कुछ लोग सब्जी में गए हैं। कुछ लोग flower में गए हैं और ज्यादातर लोग pulses में गए हैं। हम चाहते हैं pulses को हम promote करें। आज भी भारत को बहुत बड़ी मात्रा में pulses का एक portion import करना पड़ता है। pulses की हमारी requirement बहुत है। और इसलिये हम शुगर के साथ-साथ pulses को अगर बढ़ावा देंगे, तो एक assured market की guarantee है। एकाध बार sugar में उतार – चढ़ाव आएगा तो भी हमारे किसान को उस एक वर्ष संकट में से निकलने में भी। ये बीच वाला जो जगह की खेती का काम है उससे उनको फायदा हो सकता है। और उस दिशा में जितने ज्यादा research हो सके उस research को करने में हमें आवश्यकता देता है।

अब तक हमारा sugarcane से गन्ने से जुड़ा जो हमारा किसान था। उसका पूरा नसीब sugar mill पर depended था। sugar mill ही उसका भाग्य तय करती थी। जहां cooperative बेस मजबूत रहा और बसंत दादा पाटील कहो या शरद राव जी के पिताजी की जमाने की बात करें या बैकुठ राय मेहता करके गांव के बहुत बड़े cooperative के dedicated नेता थे। इस पीढ़ी ने opportunity की ऐसी जड़ें जमाई कि जिसके कारण आज गुजरात महाराष्ट्र किसानों का ये अनुभव है इस cooperative बेस के कारण कुछ न कुछ मात्रा में संकटों के समय उनको मदद मिल जाती है। लेकिन ये समय की मांग है कि हमने हमारे value addition में global economy को हम नजर अंदाज नहीं कर सकते। दुनिया में अगर sugar ज्यादा हो गई, तो भारत की बड़ी पिटाई हो जाती है। दुनिया में sugar कम हो गई, तो भारत को मौका मिल जाता है। कभी कभार भारत के लिए market का अवसर होता है लेकिन अकाल होता है, तो किसान उस समय में दबा हुआ होता है, तो हम उस opportunity का फायदा नहीं ले पाते हैं। एक ऐसी अवस्था में से हमारे इस क्षेत्र को संभालना पड़ता है। उसमें एक मार्ग है, जिसमें हम assurance पैदा कर सकते हैं। वो है ethanol।

आज भारत को energy का import सबसे बड़ा जो हमारा विदेशी मुद्रा जो जाते हैं। वो पैट्रोल, डीज़ल, ऑयल इन सब में जाते हैं। इथेनोल से हम इस import को कैसे कम करें। हमारे public transport system दुनिया के ब्राजील जैसे अनेक देश हैं, जिन्होंने ethanol का उत्तम तरीके से उपयोग करके पैट्रोल वगैरह को बचाया and environment friendly transportation system को लाया। हम भारत में इसकी उपयोगिता को कैसे बढ़ाएं। पिछले दो वर्ष में इथेनोल का उत्पादन और उसकी बिक्री तीन गुणा हुई है। इतिहास में highest ये 2015-16 में हुई है। लेकिन फिर भी हमारी क्षमता के हिसाब से ये काम अभी भी पीछे है। और इसलिये हमारे लिये आवश्यक है कि नीतियों के द्वारा support system के द्वारा हम value addition में खासकर के ethanol पर और देश के import को हम कैसे कम करें। हमारे transport system में और खाड़ी के तेल की झाड़ी का तेल। मेरा विश्वास है कि हमारा देश का किसान खाड़ी के तेल से मुक्ति दिलाकर झाड़ी के तेल से देश को आगे बढ़ाने की ताकत रखता है। हमने उन चीजों को बल देना है। और सरकार ने कुछ progressive policy का initiative लिया है। पहली बार ethanol में एक प्रकार का लचीला कहें लेकिन MSP टाइप व्‍यवस्‍था की ताकि market assured हुआ। कुछ sugar factory ऐसी है कि जिनके पास ethanol बनाने के plant नहीं है। हमने उनसे कहा था कि आप किसी दूसरे का काम लीजिये हम आपको compensate कर देंगे। और इसके कारण total sugarcane का product गन्ने का प्रोडक्ट उसका इतनी मात्रा में ethanol की तरफ जाने में हम सफल हो सकते हैं। sugar market डाउन जाए, तब भी हम इसको balance कर सकते हैं। sugar market की कठिनाई आ जाए, तो हम इसको divert कर सकते हैं। तो economy में balancing power के रूप में ये एक प्रयोग हमें बहुत काम कर सकता है।

और एक क्षेत्र है start-ups से। ये बात निश्चित है कि innovation की दिशा में हमने बहुत कुछ करना पड़ेगा। और जितना innovation एक फार्म में होता है। उससे भी ज्यादा innovation agriculture में आज इंजीनियरिंग के द्वारा हो रहा है। जैसे medical science totally technology driven हो रहा है। Technology जो पूरी तरह medical science में बहुत बड़ा role play कर रही है वो दिन दूर नहीं है जब agriculture sector में भी technology बहुत बड़ा major role play करने वाली है। हम हमारे नौजवानों को, हमारे साइंटिस्‍टों को, हमारे techno-experts को start-up के द्वारा मौका दें, innovation का मौका दें।

बसंतदादा पाटील के institution के द्वारा हम sugar पर केन्द्रित हो कर के खेत और sugar और sugar के Bi-product और उसके लिए कुछ मशीन्स का innovation मैंने अभी देखा, जिस प्रकार से दूध के fat निकाले जाते हैं। वैसे ही sugar content का fat, sugar का क्या स्थिति है मशीन से निकाला जा सकता है। ये मशीन अब popular हो रहे हैं। लेकिन ऐसे बहुत छोटे – छोटे मशीन हमारे नये नई पीढ़ी के युवा हौनहार नौजवान कर सकते हैं। start-up को हमने बल देना है। हमारे start-up जितनी बड़ी मात्रा में agriculture sector में आएंगे हमारे देश का किसान का कृषि एंड value addition दोनों का काम बहुत ही उपकारक होगा। और इस दृष्टि से मैं समझता हूं कि हमारे देश में जो agriculture में जो सैकेंड grid revolution की बात होती है। वो सिर्फ खेतों की साइज और कृषि उत्पादन यहां तक सीमित नहीं रह सकती हैं। कृषि उत्पादन के प्रकार genetic intervention technology upgrade, value addition and market.

इन दिनों सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के द्वारा किसान को सबसे ज्यादा सुरक्षित करने वाली योजना बीमा योजना लाई है। soil health कार्यक्रम के द्वारा किसान को अपनी जमीन में क्या, किसान की ये समस्या रही है। अगर बगल वाला किसान लाल डिब्बे वाली दवाई ले आया और अगर उसने छिड़क दी तो उसको लगता है मैं भी लाल डिब्बे वाली दवाई ले आऊँ, अगर बगल वाले किसान ने इतना पीला पाउडर डाल दिया तो उसको लगता है मैं भी पीला पाउडर डाल दूं। दोनों की जमीन का स्वभाव अलग है। दोनों की जमीन की आवश्यकता अलग है। एक की जमीन में कुछ गुण ज्यादा है, दूसरे की जमीन में दूसरे गुण ज्यादा है। soil health card के द्वारा हम अपनी जमीन की तबीयत जानें। मनुष्य के शरीर में जिस प्रकार से आज डॉक्टर जब तक कि आप blood test नहीं करवाते, urine test नहीं करवाते pathological report नहीं आता है, दवाई नहीं देता है। जमीन का भी वैसा ही है। जैसे मनुष्य के शरीर का है। हम भी अपना soil health card बहुत बड़ी मात्रा में हमारे start-ups soil testing lab बना सकते हैं। हमारे किसान भी अपनी cooperative society के द्वारा soil health lab बना सकते हैं। और हमारे किसान को आदत लगनी चाहिए कि हर वर्ष फसल में जाने से पहले एक बार जमीन की तबीयत की खबर ले लें और उसके अनुसार अपना time table बना दें। आप देखिए हमारा खर्च बहुत कम हो जाएगा।

महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा initiative लिया है, solar पम्प का solar पम्प के movement को अगर हम किसानों तक ले जाएंगे, तो हमारी cost effective farming, बिजली का खर्चा, पानी का खर्चा सबसे ज्यादा होता है। अगर हम solar pump को भारत सरकार भी मदद कर रही है। महाराष्ट्र सरकार ने भी initiative लिया है। cooperative unit भी उसके साथ जुड़े। और अगर हम बिजली बचाकर के solar के द्वारा खेती में उपयोग लाने की दिशा में जाएं, तो cost effective farming के लिए हमें बहुत लाभ पड़ सकता है और उस दिशा में हमें प्रयास करना चाहिए।

मुझे विश्वास है कि आप लोग खेती के क्षेत्र में मुझसे हजार गुणा अनुभवी लोग हैं। और मैंने देखा है शरत राव जी को वो कितनी राजनीति की आपाधापी में क्यों न हो, दिन में कितने ही राजनीति के उठापटक के दबाव में क्यों न हो, लेकिन अगर किसान की बात आ जाए, खेती की बात आ जाए, तो तुरंत active हो कर के उस काम को हाथ में ले लेते हैं। इतना उनका dedication उनके इस dedication को मैंने देखा है। और इस फरवरी में सार्वजनिक जीवन में पचास वर्ष जनप्रतिनिधि के रूप में उनका समय हो रहा है। मैं अभी से बधाई देता हूं, पचास साल तक without break जनप्रतिनिधि के रूप में चुनकर आना चुनाव जो लड़ते हैं जीतते हैं उनको पूरा पता है कि किस प्रकार से जिन्दगी जीनी पड़ती है। शरद राव जी ने जी कर दिखाया है। और एक बहुत उत्तम उदाहरण सभी सार्वजनिक जीवन के लोगों के लिए एक उत्तम उदाहरण उन्होंने प्रस्तुत किया है।

वैसे हमारे देवेन्द्र फडनवीस जी, अगर उनका मैं नागपुर के municipality में जो चुनकर के वो आए cooperator उसको हिसाब लगाऊं तो उनको भी पच्चीस वर्ष non-stop जनप्रतिनिधि का हो रहा है शायद। इतनी छोटी आयु में अगर उनका….लेकिन शरद राव का MLA और MP वाला मामला है। अपने आप में बड़ी विरासत है। सार्वजनिक जीवन की एक बहुत बड़ी पूंजी है। बहुत बड़ी विरासत है। मैं व्यक्तिगत रूप से शरद राव का अत्यंत आदर करने वाले व्यक्तियों में से रहा हूं। मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था। वो हमेशा मुझे उंगली पकड़के चलाने में मेरी काफी मदद करते रहे हैं। और ये बात सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में मैं गर्व अनुभव करता हूं। और मैं मानता हूं कि सार्वजनिक जीवन जनहित के लिये होता है।

भाइयों – बहनों एक बात इस विषय से हटकर भी मैं कहना चाहता हूं। 8 तारीख रात 8 बजे हम जानते हैं हमारे दुश्मन हमारे देश को तबाह करने के लिए उनके अपने देश में जितनी currency छापते हैं उससे ज्यादा हमारे देश में नकली नोट घुस जाए जाली नोट घुस जाए उसके खेल खेलते रहे हैं। और बड़ी – बड़ी नोटें जो असीमित रूप है। नक्सलवाद के रूप से हो उग्रवाद के नाम से हो extortion कर कर के लोगों से रुपये बढ़ाते हैं। जंगलों में पेड़ के नीचे दबाकर रखते हैं। arms लेते हैं। आतंकवाद को बल मिलता है। इनकी ये जो दोहरी नस है जहां से उनको पैसा आता है। उसको काटना बहुत जरूरी था। इसलिये 8 तारीख रात 8 बजे 1000 और 500 के नोट जाली नोट इन सब पर एक बहुत बड़ा निर्णय सरकार ने किया है। देश की जनता ने जो उसको आशीर्वाद दिये हैं। मैं इसके लिए देश की जनता का आभारी हूं। एक भ्रम फैलाया जा रहा है क्योंकि यहां बड़ी मात्रा में किसान है। इसलिये मैं कहना चाहता हूं। किसानों को भ्रमित किया जाता है कि अब 1000 और 500 की नोटें गई और आपके पास खेती से कमाई करके जो पैसा आया है, वो bank में जमा करना पड़ेगा और फिर मोदी उस पर tax लगाएगा। मेरे किसान भाइयों आप पर कोई tax लगने वाला नहीं है। आप बेफिक्र रहिये। ये देश आपका है ये पैसे आपके हैं ये बैंक भी आपकी है ये मोदी भी आपका है। तो इन सारे भ्रमजालों से, लेकिन हम ये बात सही है। मैंने देश की जनता से 8 तारीख को ही 50 दिन मांगे हैं। क्योंकि इतना बड़ा बदलाव लाना आपको मालूम होगा, 1978 में जब जनता पार्टी की सरकार थी, तब मुरारीजी भाई देसाई उन्होंने 1000 के नोट बंद की थी। मैं कोई पहला नहीं हूं जिसने काम किया है। उसके बाद UPA सरकार थी। उसने चवन्नी बंद की थी। आपको शायद याद होगा उन्होंने चवन्नी पर प्रतिबंध लगाया था। अब वो तो आप जाने। लेकिन मुरारीजी भाई 1000 के नोट पर बंदी लगाई थी। लेकिन उस समय रिज़र्व बैंक ने total 145 करोड़ rs – 145 करोड़ रुपयों की मूल्य की 1000 के नोटें छापी थीं। और उसमें से सिर्फ 80 करोड़ – सिर्फ 80 करोड़ Public में थीं। 65 करोड़ बैंकों में पड़ी थीं बाहर निकली भी नहीं थी। इस समय देश में 500 और 1000 के नोट इसकी value करीब- करीब 14 लाख करोड़ रुपया है। कहां 145 करोड़ और कहां 14 लाख करोड़ और इसी का फायदा दुश्मनों ने समाजद्रोहियों ने भ्रष्टाचारियों ने इसका फायदा उठाया है। अगर इसको जड़ से नहीं उखाड़ के फैंकेंगे तो देश की भावी पीढ़ी को उसको सपनों को पूरा करने में हमारी व्यवस्था ही रुकावट बन जाएगी। और इसलिए मेरे प्यारे भाइयों – बहनों ये मैं नहीं कह सकता कि इतने बड़े निर्णय से कोई तकलीफ ही न हो। मैंने पहले दिन कहा था असुविधा होगी। कष्ट होगा, तकलीफ होगी, लेकिन इसे 70 साल की बीमारी इससे मुक्ति का रास्ता खुल जाएगा मेरे भाइयों –बहनों भावी पीढ़ी के लिए रास्ता खुल जाएगा। गरीब मध्यवर्ग का आदमी गर्व के सात माथा ऊंचा कर कर के जी सकेगा। मैं देशवासियों से इस भगीरथ काम के लिए कुछ असुविधा रहते हुए भी सहयोग करने का आग्रह कर रहा हूं। कुछ लोग होंगे जिनकी तकलीफ जरा ज्यादा होगी। वे पता नहीं क्या क्या करेंगे। लेकिन उनकी मुझे ज्यादा चिंता नहीं है। मुझे चिंता देश के सामान्य नागरिक कि है।

और मैं आपको विश्वास दिलाता हूं। आपको अपना 500 का नोट किसी को 499 में भी देने की जरूरत नहीं है। आपका 500 का 500 आपका हक का है आपको मिलेगा। आपको 1000 के नोट में से दस रुपया भी किसी को कम करने की जरूरत नहीं है। आपका 1000 का पूरा 1000 मिलेगा। बस मुझे 30 दिसम्बर तक मैंने पचास दिन का समय मांगा है। व्यवस्थाएं चल रही हैं हां, ये चीजें 8 तारीख के पहले मैं कर ही नहीं सकता था। वरना ये चीजें छिपी नहीं रहती थीं। ये लीक हो जाती। और लीक हो जाती तो जो इसके शहंशाह हैं, जिनके घर में बोरी की बोरियां भरी पड़ी हैं, वो तो इसका मैदान मार लेते। मैं गरीब के लिए हूं गरीब के हक के लिये हूं। सामान्य मानवी के लिये हूं। सामान्य मानवी के हकों के लिए हूं। इसलिये कष्ट होगा इसका पूरा अंदाजा था। शुरू के कुछ दिनों में बैंकों से पैसे पहुंचने में तकलीफ होनी थी। लेकिन मुझे विश्वास है देशवासी 30 दिसम्बर तक मेरी मदद करंगे। देश में शुचिता के लिये शुद्धीकरण के लिए प्रामाणिकता के इस पर्व के लिए आपका पूरा सहयोग रहेगा।

इसी एक अपेक्षा के साथ फिर एक बार बसंत राव दादा को बहुत बहुत अभिनन्दन करता हूं। प्रणाम करता हूं श्रद्धांजलि देता हूं। और ये शताब्दी वर्ष किसानों के जीवन में बदलाव लाने के लिए आधुनिक कृषि की तरफ हमें ले जाने वाला बने यही मेरी शुभकामना है। मुझे इस अवसर पर आने का मौका मिला। मैं शरद राव का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि मुझे उन्होंने इतने प्यार और सम्मान के साथ इतने बड़े महत्वपूर्ण अवसर पर निमंत्रित किया। बहुत – बहुत धन्यवाद।