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प्रधानमंत्री की चीनी मीडिया संगठनों से बातचीत


प्रधानमंत्रीः सभी को मेरा नमस्कार। हमें बातचीत शुरू करनी चाहिए? मैं आज अहमदाबाद जा रहा हूं। प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में यह मेरी पहली बैठक होगी। चीन के माननीय राष्ट्रपति कल वहां पहुंच रहे हैं। यह बेहद प्रसन्नता का विषय है कि हम चीन के राष्ट्रपति का स्वागत गुजरात में करेंगे। मेरा मानना है कि चीन के राष्ट्रपति का अपनी भारत यात्रा में गुजरात को शामिल करने का फैसला अच्छी बात है, न सिर्फ इसलिए कि गुजरात प्रधानमंत्री मोदी का गृह राज्य है बल्कि इसलिए भी कि भारत-चीन और गुजरात-चीन के संबंधों की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रासंगिकता भी है। चीन का वो प्रांत जहां से माननीय राष्ट्रपति आते हैं, उस प्रांत में एक छोटा सा कस्बा है जिसका गुजरात के लोगों से पुराना रिश्ता-नाता है। वहां सबसे पहले पहुंचने और कारोबार स्थापित करने वालों में गुजरात के कुछ एक लोग शामिल हैं। 600 ईस्वी में भारत आए संत जुआन जंग गुजरात भी गए थे और वह जिस गांव में ठहरे थे उसी गांव से मैं आता हूं। बौद्ध धर्म के माध्यम से भारत और चीन में, विशेष रूप से चीन और गुजरात के बीच बहुत ही घनिष्ठ संबंध विकसित हुए। इस नजरिये से देंखे तो उनका गुजरात आगमन विशेष ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के एक रिश्ते की याद दिलाता है।

प्रश्नः भारत-चीन का संबंध एक स्वाभाविक सहयोगी का है। चीनी सरकार भारत-चीन के रिश्ते को कूटनीतिक प्राथमिकताओं में से एक के रूप में देखती है। माननीय प्रधानमंत्री जी, हम आपसे सुनना चाहते हैं कि भविष्य में दोनों देश अपने रिश्तों को औऱ प्रगाढ़ बनाने के लिए क्या कर सकते हैं?

प्रधानमंत्रीः इस प्रश्न के लिए आपको धन्यवाद। मेरा मानना है कि भारत-चीन का संबंध विशेष औऱ अनूठी प्रकृति का है। भारत और चीन एक दूसरे से ऐतिहासिक औऱ सांस्कृतिक रूप से जुड़े हुए हैं। भारत औऱ चीन दोनों के पास समृद्ध परंपराएं हैं। भारत और चीन के पास आज दुनिया की आबादी का लगभग 35% हिस्सा है। विशुद्ध गणितीय बिन्दु से देखा जाए तो दुनिया की आबादी की 35% की बेहतरी और गरीबी का उन्मूलन जिस तरीके से किया गया है; अगर दोनों देश एक साथ काम करना निश्चत कर लें तो यह तय है कि वे दुनिया में प्रगति और विकास के लिए बड़ा द्वार खोल देंगे। इससे बाकी के 65% आबादी के लिए अच्छी तरह से वृद्धि करने में वक्त नहीं लगेगा। गणितीय तौर पर यदि दुनिया की आबादी का 35% हिस्सा एक साथ मिलकर काम करता है औऱ गरीबी उन्मूलन विधि के जरिये अपने लोगों की आर्थिक हालत में सुधार कर लेता है तो; इससे न केवल दुनिया की आबादी के 35 फीसदी हिस्से का अत्यधिक विकास होगा बल्कि इसके चलते दुनिया की बाकी 65 प्रतिशत जनसंख्या का भी तेजी से विकास होगा। अगर आप इतिहास में जाकर देंखे तो पता चलेगा कि दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारत और चीन का बड़ा योगदान है। दोनों देश मिलकर विश्व की जीडीपी में आधे से ज्यादा का योगदान देते हैं। सिर्फ गणितीय लिहाज से ही नहीं बल्कि भारत और चीन की सोच भी काफी हद तक मिलती है। भारत और चीन ने जब भी मिलकर साथ काम किया तथा आगे बढ़े हैं तब दोनों देशों ने विकास और आर्थिक समृद्धि के लिए दुनिया को प्रेरित किया है। आपने भारत में सुना होगा हम सुगर को हिन्दी में ‘चीनी’ कहते हैं। इसे बिना किसी वजह चीनी नहीं कहा जाता है बल्कि चीन की तकनीक की बदौलत हम इसे चीनी कहते हैं। इस तकनीक के जरिए हम शुगर को परिष्कृत एवं शुद्ध कर खाने योग्य बनाने में सक्षम हैं। इस तकनीक की वजह से ही हमनें शुगर को चीनी कहना शुरू किया है। दोनों देशों और यहां के लोगों के बीच गहरे संबंधों का लंबा चौड़ा इतिहास है। हमारे गहरे संबंधों और समान सोच ने मुझे आश्वस्त किया है हम मिलकर इतिहास लिख सकते हैं। और पूरी मानव जाति के लिए सुनहरे कल का निर्माण कर सकते हैं।

प्रश्नः चीन ने हाल के वर्षों में नए सिल्क रूट की शुरुआत की है। यह नया सिल्क रूट भविष्य में भारत के लिए अवसर होगा या खतरा?

प्रधानमंत्रीः एशिया में व्यापार के प्राचीन रास्ते रहें हैं जिसमें सिल्क रूट, स्पाइस रूट सहित इस तरह के दूसरे रूट यानी मार्ग भी शामिल रहे हैं। ये इस क्षेत्र में व्यापार के जीवंत माध्यम थे और इसके अलावा एशिया में ये आर्थिक समृद्धि के भी रास्ते थे। इसमें महत्वपूर्ण बात यह थी कि ये रास्ते विचारों के आदान-प्रदान, संस्कृति, कला, धर्म औऱ आध्यात्मिकता को बढ़ावा देते थे। भारत इनमें से कई व्यापारिक रास्तों का केंद्र हुआ करता था और ये मार्ग समाज के साथ अपने सदियों पुराने ज्ञान को साझा करते थे। आप इससे पूरी तरह से वाकिफ हैं कि इसी सिल्क मार्ग के जरिये भगवान बुद्ध ने शांति के संदेश का प्रसार किया था। जिसने चीनी सभ्यता पर एक अमिट छाप छोड़ दिया। भारत भी चीन की सुगर को परिष्कृत कर ‘चीनी’ बनाने जैसी प्रौद्योगिकी से लाभान्वित हुआ है। इसीलिए भारत में सुगर को चीनी कहा जाता है। प्राचीन व्यापार मार्गों का सफलपूर्वक पुनरुद्धार न केवल संपर्क और अपेक्षित बुनियादी सुविधाओं के लिए आवश्यक है बल्कि इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आपसी समृद्धि तथा वाणिज्य एवं विचारों के मुक्त प्रवाह के लिए शांति, स्थिरता, आपसी विश्वास और सम्मान, समर्थन का वातावरण तैयार किया जाए। मेरा विश्वास है कि प्राकृतिक व्यापार मार्गों का फिर से उभार एक समृद्ध एशिया के निर्माण के लिए इस सदी में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

प्रश्नः क्या आप सोचते हैं कि चीन और भारत साथ मिलकर एशिया सहित पूरी दुनिया में शांति तथा विकास को बढ़ावा दे सकते हैं?

प्रधानमंत्रीः भारत और चीन प्राचीन सभ्यताएं हैं तथा दोनों ने युगों से इस दुनिया में बहुत योगदान दिया है। आज हम दोनों दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं। साथ ही तेजी उभरती हुई अर्थव्यवस्था भी हैं। शायद इतिहास में यह अभूतपूर्व है कि एक पैमाने पर और एक गति से दोनों देश एक साथ बदल रहे हैं जो दोनों देशों को एक दूसरे की वृद्धि को सुदृढ़ बनाने का अवसर प्रदान करता है। साथ ही एक ही समय में क्षेत्र में समृद्धि को अग्रिम तथा एशिया के आर्थिक पुनरुत्थान को बनाए रखने का भी अवसर मुहैया करता है। यह तभी संभव हो सकता है जब हम सामरिक संचार को मजबूत बनाकर, पारस्परिक विश्वास और आत्मविश्वास को बढ़ाकर; एक दूसरे के प्रति संवेदना प्रदर्शित कर, चिंताओं और हितों; हमारे संबंधों में शांति, स्थिरता और शांति का वातावरण बनाए रखने के लिए जारी प्रयास; और द्विपक्षीय सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के लिए अवसरों का अधिकार एक दूसरे को मुहैया कराएं।

प्रश्नः प्रधानमंत्री जी, अब पूरी दुनिया आपको भारत के एक मजबूत, व्यावहारिक और निर्णायक नेता के रूप में पहचानती है। जब से आपने प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाला है तब से चीन की भारत से संबंधों को सुधारने को लेकर उम्मीद बढ़ गई है। आपकी सरकार भी पड़ोसी देशों के साथ काम करने को उच्च स्तर पर महत्व दे रही है। 21वीं सदी में आप भारत-चीन संबंधों को कैसे फिर से परिभाषित करेंगे, खासकर मौजूदा वैश्विक हालातों में? अपने पांच साल के कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंधों के विकास को लेकर आपके पास क्या खाका या रोड मैप है। चुनाव प्रचार के दौरान आपने अपने से पूर्व की सरकार पर विभिन्न वादों को पूरा न कर पाने की अक्षमता का आरोप लगाया था जैसे कि विदेश नीति। आप भारत-चीन संबंधों को उन्नत बनाने को लेकर एक अलग और उच्च किस्म का प्रस्ताव कैसे तैयार करेंगे?

प्रधानमंत्रीः आपने कई अहम सवाल किए हैं।

मेरी सरकार की उच्च प्राथमिकता में चीन के साथ बेहतर रिश्ता भी है। चीन हमारा सबसे बड़ा पड़ोसी है। प्रत्येक देश के लिए पड़ोसियों के साथ संबंध विशेष महत्व रखता है क्योंकि उनकी नियति आपस में जुड़ी होती है। इसीलिए मैंने भी भारत के पड़ोस पर विशेष जोर दिया है। लेकिन, मैंने केवल चीन के साथ संबंधों पर इसलिए जोर दिया है क्योंकि हम सदियों पुराने साथी हैं। चीन इस क्षेत्र और दुनिया के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

यह एक आम सहमति है कि 21 वीं सदी एशिया की सदी है। अगर पीछे इतिहास में देंखे तो 300 साल पहले भारत और चीन की वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 50% से अधिक की हिस्सेदारी रही है। हम दुनिया में मुख्य प्रौद्योगिकी और विचारों के स्रोत थे। हमारी दोनों सभ्यताओं ने जबरदस्त लचीलापन दिखाया है और अब हम आर्थिक विकास तथा नवाचार को लेकर एक बार फिर महत्वपूर्ण केंद्र हैं। आर्थिक गुरुत्वाकर्षण का केंद्र फिर एशिया की ओर जा रहा है। जैसा कि मैंने कहा, 2.5 अरब लोगों के जीवन का परिवर्तन क्षेत्र और दुनिया के लिए बहुत महत्व की एक घटना है। इसके अलावा, एक दूसरे से जुड़ी और एक-दूसरे पर निर्भर दुनिया के अंतर्गत हम दोनों देशों के बीच बढ़े हुए सहयोग का दुनिया के सभी देशों को फायदा मिलेगा।

हम एक करीबी विकासात्मक साझेदारी की तलाश कर रहे हैं। हार्डवेयर में चीन की ताकत से भारत में विनिर्माण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के निर्माण और विकास में फायदा हो सकता है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां भारत तेजी से प्रगति करना चाहता है। दूसरी ओर, सॉफ्टवेयर में भारत की ताकत चीनी कंपनियों को और अधिक कुशल और प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद कर सकते हैं। हम दोनों के बीच बढ़े पर्यटन से लोगों के बीच समझ को बढ़ाने में मदद मिलेगी। हम दोनों देशों के बीच एक मजबूत क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को बढ़ाकर दोनों को लाभ पहुंचा सकते हैं।

मैं उपयुक्त नीतियों और हमारी राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के समय पर कार्यान्वयन के माध्यम से अपनी अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को अपने वादे के रूप में पूरी क्षमता से साकार करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। साथ ही मैं अपने लोगों के उद्यम और ऊर्जा को भारत में एक अनुकूल माहौल बनाने के लिए खोलना और पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय भागीदारी का उन तक लाभ पहुंचाना चाहता हूं।

हम अपनी क्षमता बढ़ाने और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने के लिए आपसी और समान सुरक्षा के सिद्धांत का पालन करें। हमें एक-दूसरे की चिंताओं और आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। और बेहतर समझ बनाने के लिए हमें दोनों देशों के लोगों के बीच आदान-प्रदान को भी बढ़ाना चाहिए। इन मुद्दों के समाधान के लिए हमारे संबंधों में माहौल बदलने और संबंधों का अहसास कराने की जरूरत है। मैं हमारे द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने और दोनों देशों के आपसी मुद्दों का समाधान निकालने की अग्रसर हूं।

प्रश्नः राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने चीन के राष्ट्रपति श्री शी जिनपिंग को औपाचारिक निमंत्रण दिया और आपने श्री जिनपिंग को गुजरात आने का न्योता दिया। हम इसका एक कारण तो जानते हैं कि गुजरात आपका गृह राज्य है। श्री जिन को गुजरात आमंत्रित करने का कोई दूसरा अन्य कारण या मतलब?

प्रधानमंत्रीः मेरा प्रयास होता है कि भारत दौरे पर आने वाले विदेशी नेताओं को नई दिल्ली के अलावा यहां की दूसरी जगहों को देखने का भी मौका मिले। इसका आशय उन्हें भारत और उसकी विविधता को देखने औऱ विचार करने का मौका मुहैया करना है। देशों के बीच संबंधों को खासकर भारत और चीन जैसे बड़े देशों के संबंधों को राजधानी, शहरों और प्रमुख महानगरीय केंद्रों के संकीर्ण दायरे तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। चीन का गुजरात के साथ पुराना संबंध है। प्राचीनकाल में, गुजरात और चीन के बीच जीवंत व्यापार संबंध थे। चीनी भिक्षु जुयान झांग ने गुजरात में एक लंबा समय बिताया था। वर्तमान में, कई चीनी कारोबरियों की निर्माण इकाइयां गुजरात में स्थापित हैं वहीं कई गुजराती कारोबारियों की निर्माण इकाइयां चीन में स्थित हैं। चीनी नेताओं ने आर्थिक और सामाजिक विकास के ‘गुजरात मॉडल’ को समझने के लिए अपनी इच्छा गुजरात दौरे पर जाने को लेकर व्यक्त की है।

मैं एक अंतिम बात कहना चाहता हूं। मैं चीन के राष्ट्रपति के साथ अपनी कल की बैठक को एक नई शब्दावली देना चाहूँगा। मैं इसे “इंच से मील की ओर बढ़ना” कहता हूं। इंच (INCH) का मतलब है “इंडिया-चाइना” है और मील की तरफ बढ़ने का अर्थ है “असाधारण तालमेल के साथ सहस्त्राब्दी की ओर जाना” यानी (Millennium of Exceptional Synergy)। मेरा विश्वास है कि मेरी कल की बैठक “इंच से मील की ओर बढ़ना” के इस लक्ष्य की दिशा में एक सुखद शुरुआत का प्रतीक बनेगा।