पीएमइंडिया
महामहीम राष्ट्रपति जी, आदरणीय उपराष्ट्रपति जी, आदरणीय अध्यक्ष महोदय, आदरणीय मनमोहन सिंह जी, आदरणीय आडवाणी जी, उपस्थित सभी वरिष्ठ महानुभाव, भाईयो और बहनो। जिन तीनों महानुभवों को उनके उत्तम कार्य के लिए आज सम्मानित किया जा रहा, उन तीनों को मैं हृदयपूर्वक अभिनंदन करता हूं, और मुझे विश्वास है कि पिछले कुछ वर्षो से यह जो परम्परा चली है वह और सासंदों के लिए भी एक प्रेरणा बनेगी। हरेक को लगेगा एक सासंद के रूप में मेरी भूमिका में भी, यह जो वरिष्ठ महानुभव है उनके जो उच्च आचरण है, उनकी बातों में जो गहराई है, विचारों की जो स्पष्टता है, उस तक पहुंचने का मैं भी प्रयास करूं। यह भाव हम जैसे जितने भी नए सदस्य है सबके मन में जगेगा हमें एक नई प्ररेणा मिलेगी।
मैं यह मानता हूं कि बौद्धिक प्रतिभाएं तो बड़ी नजर आती है, बात को बहुत बढ़िया ढंग से रखने वाले लोग भी नजर आते है, लेकिन संसद वस्तुरूप कला के आधार पर नहीं चलती है। जब तक नेतृत्व, कर्त्तत्व, और वक्तव्य तीनों का सही मिलन नहीं होता है तब तक वह शब्दों, वह भाव, वह विचार संसद को प्रभावित नहीं कर सकते है और न ही देश को प्रेरणा दे सकते हैं और इसलिए जिन महानुभवों ने आज यह अवॉर्ड प्राप्त किया है वह सिर्फ वक्तव्य से जुड़ा हुआ नहीं है उनके कर्त्तव्य, उनके नेतृत्व से भी जुड़ा हुआ है। देश भारत के संसद से बहुत अपेक्षाएं कर रहा हैं। कभी-कभी संसद के अंदर जो हमें अवॉर्ड देते है कभी जनता का भी सर्वे किया जाना चाहिए कि इस सत्र मेँ जनता ने संसद को कैसे लिया और बड़े प्रोफेशनल-वे में जन-अभिप्राय प्रकट करने चाहिए। सामान्य मानव पूरी संसद को किस रूप में देख रहा है, क्या अनुभव कर रहा है़, तो हो सकता है, हम जहां है वहां से आगे बढ़ने की हमें प्रेरणा मिल सके।
मैं आदरणीय स्पीकर महोदय से भी प्रार्थना करना चाहूंगा कि अगर हो सके तो भारत की सभी विधानसभाओं की स्पीकरों को बुलाकर यही परम्परा राज्यों में भी कैसे आरंभ हो। इसके लिए अगर तो मैं समझता हूं कि एक अच्छाई की दिशा में हम एक कदम जरूर उठा सकते हैं। एक और बात थी मुझे, जब मैं जब विधानसभा में था तब भी और संसद में कुछ समय से आया हूं तब भी, एक कमी मुझे महसूस हो रही है और यह कमी यह है कि पहले जब किताबों में जो पढ़ते थे या पुराने लोगों से सुनते थे तो हमारे विधानसभा हो या संसद का सदन हो व्यंग्य और विनोद बहुत मुखरकर के प्रकट होता था। इन दिनों व्यंग्य और विनोद करीब-करीब हमारी पार्टी से खत्म होता जा रहा है। और इसका एक कारण भी है, एक कहावत कोई बोल दे तो पता नहीं24 घंटे वाले उसके क्या अर्थ निकालेंगे और 24 घंटा क्या करेंगे चर्चा। तो बोलने वाला इतना डरता है और मैं यह मानता हूं कि इसके लिए कुछ गंभीरता से सोचना होगा।
मैंने पुरानी बातें सुनी हैं, दो-तीन घटनाएं तो मुझे याद हैं, एक बार शायद आजादी के पचास वर्ष का कार्यक्रम था और मैं सदन को सुनने के लिए आया था और कोई विषय पर डिवेट चल रहा था और शायद शरद पवार जी का भाषण चल रहा था और बाद में शायद सुषमा जी का भाषण हुआ और सुषमा जी ने मजाक में कहा कि मुझे समझ नहीं आ रहा है कि शरद पवार है कि ललिता पवार। लेकिन मैंने उस दृश्य को जिस प्रकार से देखा, जिस प्रकार से शरद पवार ने उसको इन्जॉय किया, उसको मने एक ऐसा पवित्र माहौल दिखता था और उस व्यंग्य को न अखबार में, मीडिया में, कोई बड़ी ऐसी भद्दे तरीके से पेश नहीं किया गया। हमारे संसद में सहज व्यंग्य और जैसे अभी स्पीकर महोदय के व्यक्त्व में आया था कि तीखापन और अरुण जेटली जी ने भी कहा, तीखापन हो सकता है हमें 24 घंटे के लिए जगह दे दें। लेकिन तीखापन न प्रभाव पैदा कर सकता है और न प्रेरणा दे सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर चीज मधुरता से ही हो, यह भी मेरा मत नहीं है, लेकिन समय की मांग है कि संसद की हर बात आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरक बने। संसद का हर वाक्य उसका अपना एक मूल्य है, उसमें कभी गिरावट नहीं आनी चाहिेए। और यह जिम्मदेारी हम सब की सामूहिक है, यह दल, वह दल, यह व्यक्ति, वह व्यक्ति उस अर्थ में नहीं है, यह हमारा सामूहिक दायित्व है।
डॉ. कर्ण सिंह जी काफी अनुभवी व्यक्ति है, सांस्कृतिक परम्पराओं से अपने आप को उन्होंने बांध के रखा हुआ है और उन्होंने जितनी वेदनाएं यहां प्रकट की हैं ये वेदना हम सब के आत्मचिंतन के लिए काम आएगी और मैं मानता हूं कि जिन्होंने इतने साल सदन के माध्यम से राष्ट्र की सेवा की है, उनके दर्द को भी जानना, उस वेदना को अनुभव करना और उसके अनुकूल उनके आशा, अपेक्षा के प्रति साथ देना यह भी, उनके आज के अवॉर्ड के साथ एक नई गरिमा को लेकर आएगा, ऐसा मुझे लगता है। मैं फिर एक बार इन तीनों महानुभवों को हृदयपूर्वक अभिनंदन करता हूं।
मैं भी नया हूं मुझे भी बहुत कुछ सीखना है, मुझे विश्वास है कि इतने वरिष्ठ लोग हैं, सब से सुनकर के, इनकी बातों को समझ करके, मैं भी कुछ सीखूंगा और शरद जी ने जो कहा आदरणीय राष्ट्रपति महोदय जी से मिलते हैं, तो उठने का मन नहीं करता है मैं सच बता रहा हूं। इतनी जानकारियां डेट, टाइम, नेम के साथ बोलते है जैसा उन्होंने कहा भाई इनके दिमाग में पता नहीं कौन सा सॉफ्टवेयर है इतना यानि, जो पूरी किताब पढ़कर मिले, उनके साथ आधा इंडिया बातचीत में मिल जाता है। हर संसद सदस्य के मन में यह इच्छा रहें की तबारीफों के साथ, इतिहास की घटनाओं के साथ, वस्तु स्थिति का पूरा परीक्षण, इन चीजों को ग्रास्प करने की आदत कैसे बनें और ऐसे महानुभावों से हम सीख सकते हैं। और यह बात सही है कि “क्लैरिटी आफ द थॉट,फेथ इन कन्विक्शन एंड करेक्शन इन एक्टस” इन तीनों को लेकर हम अगर सदन की गरिमा को बढ़ाना चाहते हैं, अवश्य बढ़ा सकते हैं। मेरी फिर एक बार शुभकामनाएं, धन्यवाद।