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भारत और ईरान, दो महान सभ्यताएं: पुनरावलोकन एवं संभावनाएं’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में प्रधानमंत्री का संबोधन

भारत और ईरान, दो महान सभ्यताएं: पुनरावलोकन एवं संभावनाएं’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में प्रधानमंत्री का संबोधन

भारत और ईरान, दो महान सभ्यताएं: पुनरावलोकन एवं संभावनाएं’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में प्रधानमंत्री का संबोधन


फरहिंगिस्‍तान के प्रमुख महामहिम हदीद आदेल,

ईरान के सांस्‍कृतिक मामलों के मंत्री डॉ. जनाती,

प्रतिष्ठित विद्वानों,

देवियों और सज्‍जनों,

मुझसे पहले डॉ. आदेल और डॉ. जनाती के ज्ञानपूर्ण शब्‍दों ने इस सम्‍मेलन के लिए माहौल तैयार कर दिया है। यह सम्‍मेलन सबसे आदर्श समय पर हो रहा है। यह अवसर हमारे सदियों पुराने जुड़ाव को याद करने और उसका नवीनीकरण करने का है। यह उन लोगों को भी आदर्श जवाब है, जो हमारे समाज में कट्टरपंथी विचारों का प्रचार करते हैं। यह सम्‍मेलन हमारी युवा पीढ़ी का हमारी सुंदर एवं समृ‍द्ध सांस्‍कृतिक विरासत से परिचय कराने की जिम्‍मेदारी को भी परिपूर्ण करता है। इस काम के लिए यहां उपस्थि‍त प्रबुद्धजनों एवं विद्वानों से ज्‍यादा योग्‍य कोई और नहीं है। मैं विशेष रूप से डॉ. आदेल को बधाई देता हूं, जो इस जरूरत को समझने में दूसरों से काफी आगे हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के विश्‍व ज्ञानकोष को फारसी में रूपांतरित करने की उनकी मौजूदा योजनाएं अनुसंधानकर्ताओं एवं विद्वानों के लिए एक बड़ी सेवा है। ईरान के विद्वानों और विचारकों के बीच आना सम्‍मान और सौभाग्‍य की बात है।

मित्रों,

विश्‍व में आज राजनीतिक पंडित सामरिक संमिलन की बात करते हैं। लेकिन भारत और ईरान, दो ऐसी सभ्‍यताएं हैं, जो अपनी महान संस्‍कृति के मिलन का उत्‍सव मनाती हैं। दुर्लभ फारसी पांडुलिपि कलीला-वा-दिमनाह, जो कि अभी रिलीज की जानी है, भारत और ईरान के बीच घनिष्‍ठ ऐतिहासिक संबंधों को दर्शाती है। यह उल्‍लेखनीय है कि कैसे जातक और पंचतंत्र की भारतीय कहानियां फारसी की कलीला-वादनाह बन गई। यह दो समाजों के बीच आदान-प्रदान और सांस्‍कृतिक विचारों की यात्रा का एक उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है। यह इस बात का एक सुंदर प्रदर्शन है कि कैसे दो संस्‍कृतियां और देश, एक समान सोचते हैं। यह हमारी प्राचीन सभ्‍यताओं के ज्ञान का एक वास्‍तविक चित्रण है। मीठा पसंद करने वालों के लिए यह भारत से आने वाली शक्‍कर की तरह है। मैं इसमें कोई मदद नहीं कर सकता, लेकिन मुझे हाफिज़ की कुछ लाइनें याद आ रही हैं। हालांकि ये इस अवसर के एकदम उलट हैं:

शक्कर-शिकन शवंद हमे बुलबुलाने-अजम

ज़े ईन क़दे-हिन्दी कि बे-तेहरान मी रसद्

(अर्थ-ईरान की सारी बुलबुलें भारत से तेहरान में आने वाली ताजा शक्‍कर खाती हैं।)

मित्रों,

सदियों से विचारों एवं परंपराओं, कवियों एवं कारीगरों, कला एवं स्‍थापत्‍य कला, संस्‍कृति एवं व्‍यापार के मुक्‍त आदान-प्रदान ने हमारी सभ्‍यताओं को समृद्ध किया है। हमारी विरासत भी हमारे देशों के लिए ताकत और आर्थिक विकास का एक स्रोत रहा है। फारस की विरासत की समृद्धि, भारतीय समाज के ताने-बाने का अभिन्‍न हिस्‍सा है। ईरानी संस्‍कृति का एक हिस्‍सा भारतीय दिलों में रहता है और भारतीय विरासत का एक टुकड़ा ईरानी समाज में बुना है। हमारे प्राचीन नायकों और महाकाव्‍यों में जबरदस्‍त समानताएं हैं। भारत में अजमेर शरीफ और हजरत निजामुद्दीन की दरगाह ईरान में भी समान रूप से लोकप्रिय है। महाभारत और शाहनामा, भीम और रूसतम, अर्जुन और अर्श, हमारे विचारों एवं मूल्‍यों की समानता प्रदर्शित करते हैं। जरदोजी, गुलदोजी और चंदेरी जैसे शिल्‍प ईरानी समाज का एक हिस्‍सा हो सकते हैं, लेकिन ये भारत में भी समान रूप से प्रचलित हैं। ईरान की समृद्ध संस्‍कृति में कविता और उसकी फारसी भाषा की सुंदरता को कौन भूल सकता है। भारत में हम इसे अपने में से एक मानते हैं। भारत के महान मध्‍ययुगीन कवियों ने फारसी और संस्‍कृत को दो बहनें बताया है। भारत के धार्मिक महाकाव्‍य रामायण, जिसका एक दर्जन से अधिक फारसी में अनुवाद हो चुका है, यह करीब 250 फारसी शब्‍दों के लिए भी जाना जाता है। मध्‍यकालीन भारत में फारसी का इस्‍तेमाल अदालती भाषा के रूप में किया गया। लेकिन इसकी लोकप्रियता इसलिए भी है क्‍योंकि कि यह भारतीयों के दिल में लिखी है। यह भारत में लगभग 40 विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। ऑल इंडिया रेडियो पिछले 75 वर्षों से फारसी भाषा सेवा चला रहा है। भारत में सार्वजनिक और निजी संग्रहों में फारसी की लगभग पांच लाख पांडुलिपियों का संग्रह हैं। राष्‍ट्रीय एवं राज्‍य अभिलेखागार में फारसी के 20 लाख से अधिक दस्‍तावेज हैं। इनमें से कई सांझी विरासत हैं। यानि इन्‍हें ईरानी लेखकों ने लिखा है और भारतीय कलाकारों द्वारा चित्रित किया गया है। हैदराबाद में सालार-जंग संग्रहालय में इस तरह के संयोजन वाली कई पांडु‍लिपियों को पाया जा सकता है। भारत में फारसी समेत सभी पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है। हर साल भारत के राष्‍ट्रपति फारसी विद्वानों को पुरस्‍कार प्रदान करते हैं।

देवियों और सज्‍जनों,

दो प्राचीन सभ्‍यताओं के रूप में हम अपनी समावेशी और विदेशी संस्‍कृतियों का स्‍वागत करने की क्षमता के लिए जाने जाते है। हमारा संपर्क महज अपनी संस्‍कृतियों से परिष्‍कृत नहीं हैं। उन्‍होंने विश्‍व स्‍तर पर उदारवादी और सहिष्‍णु समाज के विकास में योगदान दिया है। सूफीवाद हमारे प्राचीन संबंधों का बहुमूल्‍य फल हैं। यह समूची मानव जाति के लिए सच्‍चे प्‍यार, सहिष्‍णुता और स्‍वीकार्यता का संदेश देता हैं। सूफीवाद की भावना, भारतीय अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ में भी दिखाई देती है, जिसका अर्थ है कि पूरा विश्‍व एक परिवार है।

मित्रों,

भारत और ईरान हमेशा भागीदार और मित्र रहे हैं। हमारे ऐतिहासिक संबंधों को उतार-चढ़ाव के दौरान अपने-अपने हिस्‍से से देखा जा सकता है। लेकिन हमारी साझेदारी, दोनों के लिए असीम शक्ति का स्रोत बनी हुई है। समय आ गया है कि हम अपने पारंपरिक संबंधों और जुड़ाव के गौरवशाली अतीत को फिर से आगे करें। दोनों के लिए एक साथ आगे बढ़ने का समय आ गया है। इस प्रयास में आप जैसे प्रख्‍यात विद्वानों को एक निर्णायक भूमिका निभानी हैं।

‘भारत और ईरान, दो महान सभ्‍यताएं: पुनरावलोकन एवं संभावनाएं’ पर आयोजित सम्‍मेलन का उद्घाटन करते हुए मुझे अत्‍यंत हर्ष हो रहा हैं। आपके सम्‍मेलन की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएं देते समय, मेरी नजर आपके विचार-विमर्श से निकलने वाले उपायों पर रहेगी। मुझे यह देखकर प्रसन्‍नता हो रही है कि इस सम्‍मेलन के आयोजन के लिए आईसीसीआर और फरहिंगिस्‍तान मिलकर काम कर रहे हैं। आपका विचार-विमर्श वास्‍तव में हमारे साहित्यिक, शैक्षणिक और लोगों से लोगों के संपर्कों को मजबूती प्रदान करता हैं।

एक बार फिर मुझे आमंत्रण देने के लिए आप सभी का धन्‍यवाद।

मैं आप सभी को और इस सम्‍मेलन को शुभकामनाएं देता हूं।

शुकरान, धन्‍यवाद।