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मंत्रिमंडल ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के परिप्रेक्ष्य में विदेश व्यापार नीति 2004-09 के तहत टारगेट प्लस स्कीम के कार्यान्वयन को मंजूरी दी


प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2006 के सिविल एप्लिकेशन नंबर 554 में टारगेट प्‍लस स्‍कीम (टीपीएस) 2004-09 के संदर्भ में सर्वोच्‍च न्‍यायालय के 27 अक्‍टूबर 2015 के फैसले पर अमल करने के लिए मंजूरी दी है।

माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय के फैसले से उत्‍पन्‍न टीपीएस के तहत राजस्‍व निहितार्थ करीब 2,700 करोड़ रुपये है।

लाभ का विस्‍तार वर्ष 2005-06 के लिए एफटीपी के अंतर्गत प्रारंभिक रूप से अधिसूचित टीपीएस योजना के प्रावधानों के अनुसार और देशभर के लिए विदेश व्यापार नीति 2004-09 के प्रावधानों के अनुसार सभी पात्र आवेदक निर्यातकों के लिए किया जा रहा है।

टरगेट प्‍लस स्‍कीम (टीपीएस) 2005-06 को आंशिक तौर पर पहले ही लागू किया जा चुका है। हालांकि पूर्वव्‍यापी अधिसूचना के परिणामस्‍वरूप इनकार किए गए दावों को अब सर्वोच्‍च न्‍यायालय के निर्देश के अनुसार 2006 के सीए संख्‍या 554 के तहत निपटाया जाएगा। इस योजना को 01.04.2006 से प्रभावी तौर पर बंद कर दिया गया है।

दावों को दिनांक 20.02.2006 की अधिसूचना संख्‍या 48 और दिनांक 12.8.2006 की अधिसूचना संख्‍या 8 तक मूल सूचनाओं के अनुसार माना जाएगा। दावों को निपटाने के लिए दिशानिर्देश एवं रूपरेखाओं को राजस्‍व विभाग के परामर्श के साथ डीजीएफटी मुख्‍यालय द्वारा तैयार किया जाएगा। इसे मंत्रिमंडल से मंजूरी मिलने की तिथि से एक साल के भीतर पूरा करने का प्रस्‍ताव है।

इस सुधारात्मक उपाय से सरकार के साथ तमाम मुकदमेबाजी खत्‍म होगी और माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुपालन साथ टीपीएस के तहत दावे विदेश व्यापार नीति के मूल प्रावधानों के अनुसार जारी किए जाएंगे।

पृष्‍ठभूमि

माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने डीजीएफटी बनाम कनक एक्‍सपोर्ट्स एंड ओर्स शीर्षक के तहत सिविल अपील नंबर 554/2006 मामले में दिनांक 27.10.2015 को निर्यात संवर्द्धन के लिए टारगेट प्‍लस स्‍कीम पर अपना फैसला सुनाया था। फैसले में कहा गया था कि अधिसूचना संख्‍या 48/2005 दिनांक 20 फरवरी 2006 (कुछ उत्‍पादों को अयोग्‍य करार दिया गया था) और अधिसूचना संख्‍या 8/2006 दिनांक 12 जून 2006 (दरों को घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया जो पहले 5, 10 और 15 प्रतिशत थीं) को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता और वे केवल जारी होने की तिथि से ही प्रभावी होंगे।