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वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ‘खेलो इंडिया डायलॉग’ में प्रधानमंत्री का संबोधन

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए ‘खेलो इंडिया डायलॉग’ में प्रधानमंत्री का संबोधन


नमस्कार।

आप सभी ने इतने शानदार तरीके से खेलो इंडिया संवाद का ये कार्यक्रम आयोजित किया है। मैं आप सभी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं टेक्नोलॉजी के माध्यम से इस कार्यक्रम से जुड़े केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी, सभी मुख्यमंत्री, राज्य सरकार के अनेक मंत्री, संसद में मेरे सहयोगी, My Bharat के लाखों-लाख वॉलिंटियर्स का भी बहुत हृदय से अभिनंदन करता हूं। आज इस कार्यक्रम में देशभर के एथलीट्स और स्पोर्ट्स जगत के महानुभाव भी हम सबके साथ  शामिल हुए हैं।

आप सबको पता है साथियों,

दो दिन बाद, 29 अगस्त को नेशनल स्पोर्ट्स डे भी है। मैं आप सभी को, देशभर के युवाओं को और खेल जगत से जुड़े सभी साथियों को खेल दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं देता हूं। ये दिन माँ भारती की एक महान संतान, मेजर ध्यानचंद जी को, उनको याद करने का भी अवसर होता है। 100 वर्ष पहले भारतीय सेना की हॉकी टीम न्यूजीलैंड के दौरे पर टूर पर गई थी और उस टीम में ध्यानचंद जी भी थे। वो टूर भारत और न्यूजीलैंड के, स्पोर्ट्स रिलेशंस के 100 वर्ष पूरे होने का आधार है। कुछ दिन पहले मैं न्यूजीलैंड की यात्रा पर गया था। तब भी मैंने न्यूजीलैंड  में उन्हें याद किया था। मेजर ध्यानचंद जी ने जिन रिश्तों की नींव रखी थी, आज भारत उन रिश्तों की समृद्धि के लिए निरंतर काम कर रहा है।

साथियों,

मैंने इस 15 अगस्त को लाल किले से भारत का स्पोर्ट्स विजन देश के सामने रखा है। जब मैं स्पोर्ट्स की बात करता हूं, तो ये केवल मेडल जीतने तक सीमित नहीं है, ये विकसित भारत के निर्माण में भारत की खेलशक्ति और भारत की युवाशक्ति को एक साथ जोड़ने का अभियान है। मैं हमेशा कहता आया हूं – जो खेले, वो खिले। और खेल में खिलना सिर्फ मैदान पर जीतना नहीं है, खेल में खिलना मतलब व्यक्तित्व का खिलना, परिवार का खिलना और देश का गौरव बढ़ाना।

साथियों,

जब कोई खिलाड़ी सफल होता है, तो वो सफलता केवल उसकी नहीं होती, उसकी सफलता से उसके परिवार की पहचान बनती है, प्रतिष्ठा बढ़ती है। जिस स्कूल और कॉलेज में वो पढ़ा, उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है। उसके जिले और राज्य की पहचान और मजबूत होती है। यानि दुनिया उस खिलाड़ी के नाम से उस शहर या राज्य को पहचानने लगती है। और जब ऐसी अनेक सफलताओं को लेकर कोई क्षेत्र Global Sports Map पर चमकता है, तो दुनिया का उस शहर को देखने का नजरिया भी बदल जाता है। आज के इस कार्यक्रम में देश के जिन सैकड़ों जिलों के खिलाड़ी जुड़े हुए हैं, हर जिले में दुनिया के Sports Map पर चमकने की ताकत है। इस ताकत को समझते हुए ही हमें इस संवाद कार्यक्रम को आगे बढ़ाना है।

साथियों,

इस बार लाल किले से मैंने खेलों से जुड़ी एक बहुत बड़ी चुनौती की तरफ भी देश का ध्यान दिलाया है। ये चुनौती ओलंपिक्स से जुड़ी है। एक कड़वी सच्चाई ये है कि ओलंपिक्स में जितने अलग-अलग स्पोर्ट्स होते हैं, भारत की टीमें उसमें से आधे स्पोर्ट्स में हिस्सा ही नहीं लेती हैं। यानि मेडल टैली के एक बहुत बड़े हिस्से के लिए तो हम कंपीट ही नहीं करते और दशकों से ऐसा ही चला आ रहा है। 2012 के ओलंपिक्स में, उस समय भारत ने सिर्फ, 2012 में सिर्फ 13 खेलों में हिस्सा लिया था। 20 से ज्यादा खेलों में तो भारत की भागीदारी ही नहीं थी। और इन 20 से ज्यादा खेलों में कई सारे खेल ऐसे हैं, जिनका नाम तक देश में लोगों ने शायद ही सुना हो। दुनिया के दूसरे देश उन खेलों में मेडल जीतते हैं और हम उनमें हिस्सा ही नहीं लेते। हमें मेडल टैली बढ़ाने के लिए इन खेलों में भी महारथ हासिल करनी ही होगी। अब जैसे, सर्फिंग और स्पोर्ट्स क्लाइंबिंग, हमारे पास इतनी बड़ी कोस्टलाइन है, इतना बड़ा पहाड़ी क्षेत्र है, जहां इस प्रकार के स्पोर्ट्स के लिए एक स्वाभाविक रूचि हो सकती है। हमारे पास वॉटर स्पोर्ट्स से लेकर विंटर स्पोर्ट्स तक के लिए डेमोग्राफी भी है और जियोग्राफी भी है। लेकिन फिर भी हम ऐसे खेलों में दुनिया में कहीं दिखते ही नहीं हैं। इसलिए, हमें अलग-अलग जिलों में ऐसी संभावनाओं को तलाशना होगा जहां किसी एक खास स्पोर्ट्स का इकोसिस्टम विकसित हो सके,  और इसमें आज के इस कार्यक्रम की बहुत बड़ी भूमिका है।

साथियों,

जब हम 2036 ओलंपिक्स की तैयारी की बात करते हैं, तो हमारा फोकस ये होना चाहिए कि हमें आज से ही वो खिलाड़ी तैयार करने हैं जो 2036 में अलग-अलग स्पोर्ट्स के लिए क्वालीफाई और कंपीट करेंगे। और इसलिए, लाल किले से मैंने 5 साल की उम्र से 15 साल की  उम्र के खिलाड़ियों की पहचान करने के लिए एक बड़े टैलेंट हंट अभियान का ऐलान किया है। और इसमें भी हमें केवल ये नहीं देखना है कि किस बच्चे की किस खेल में रुचि है, बल्कि ये भी देखना है कि कौन सा बच्चा किस खेल के लिए फिट है। हमें उस हिसाब से ही उस बच्चे को ट्रेनिंग देनी होगी। और मैं आप सभी को भरोसा देता हूं, इसके लिए सरकार की तरफ से जो भी सपोर्ट चाहिए, सरकार उसमें आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेगी।

साथियों,

हमारी सरकार भारत में 21वीं सदी का आधुनिक स्पोर्ट्स इकोसिस्टम बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। आज स्पोर्ट्स और स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटीज से लेकर आधुनिक ट्रेनिंग सेंटर्स तक देश में एक ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है, जिसमें प्रतिभा को पहचानने से लेकर उसे दुनिया के मंच तक पहुंचाने तक हर स्तर पर सहयोग मिले। हम दुनिया के दूसरे देशों के साथ भी Sports Science, Training, Coaching और अनुभव साझा करने के लिए सहयोग बढ़ा रहे हैं।

साथियों,

Sports को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, ये आयोजन भी इसका उदाहरण है। खेलो इंडिया संवाद सिर्फ खेल की बात करने का कार्यक्रम नहीं है। ये एक ऐसे संवाद का मंच है जिसका एक-एक विचार देश के स्पोर्ट्स विजन को एक नई दिशा दे सकता है। और इसके साथ जो युवा संवाद हो रहा है, वो कार्यक्रम आपके Ideas और Aspirations को देश के सपनों से जोड़ने का बहुत बड़ा माध्यम है। इस कार्यक्रम में स्पोर्ट्स इकोसिस्टम, टैलेंट डेवलपमेंट, गवर्नेंस और विकसित भारत को लेकर युवा क्या सोचते हैं, उनके सुझाव क्या हैं, इन बातों को सुना जाएगा और policy process में शामिल किया जाएगा। इसलिए, आप सबसे कहूंगा कि जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके, इस मंच का सार्थक उपयोग कीजिए, नए Ideas आने दीजिए, युवा शक्ति के ये नए Ideas ही विकसित भारत की सिद्धि की ताकत बनेंगे।

साथियों,

हम अक्सर सुनते हैं, एक स्वस्थ समाज के लिए, एक अच्छी पारिवारिक व्यवस्था के लिए, एक बेहतर कार्यसंस्कृति के लिए स्पोर्ट्स-पर्सन स्पिरिट बहुत जरूरी होती है और ये स्पोर्ट्स-पर्सन स्पिरिट खेल के मैदान में गए बिना सीखनी बहुत मुश्किल होती है। खेल हमें केवल चैंपियन बनना ही नहीं सिखाता, बल्कि खेल हमें एक बेहतर कंपीटिटर बनना भी सिखाता है। उठना, गिरना, गिरकर फिर से उठना, स्पोर्ट्स ये ज़ज्बा हमारे भीतर लाता है।

साथियों,

खेलों से जीवन कैसे बदलता है, इसका एक बड़ा उदाहरण हमारे पैरा एथलीट्स हैं। पैरा एथलीट्स को जब कोई मैदान में देखता है, तो जीवन के बारे में सोचने का नज़रिया बदल ही जाता है। और जब वो कुछ अचीव करता है, तो उस एथलीट के साथ ही उसके पूरे परिवार को नई ज़िंदगी मिल जाती है। वो मां-बाप, भाई-बहन, जो अपने उस बच्चे को शुरुआती दिनों में संघर्ष करते देखते हैं, उनके लिए उस दिव्यांग खिलाड़ी की सफलता, उनके सपनों को, उनके हौसलों को भी एक नई ऊंचाई दे देती है।

साथियों,

मैं खुद ऐसे प्लेयर्स से हमेशा इंस्पायर होता रहा हूं, अब जैसे आपने सबने नाम जो सुने हैं,  आर्चरी में हमारी एक बेटी, एक कमाल की खिलाड़ी हैं, नाम जानते हो आप?, शीतल। जब पैरालंपिक में उन्होंने मेडल जीता, तो पूरा जम्मू-कश्मीर, पूरा हिन्दुस्तान गर्व से भर उठा। ऐसे ही हमारी एक और बेटी अवनि लेखरा हैं, जिन्होंने दो-दो बार पैरालंपिक के मेडल जीते। मैं जब भी बेटी अवनि से मिलता हूं, बहुत गर्व महसूस करता हूं। सुमित अंतिल हो, नितेश कुमार हो  और अभी-अभी तो आपने नाम सुना होगा, हमारे झंडू कुमार। ऐसे हमारे पैरा-एथलीट्स हैं, ऐसे हर साथी, हमें भी प्रेरित करते हैं।

साथियों,

स्पोर्ट्स, एक बेहतर जीवन की गारंटी है। स्पोर्ट्स हमें बेहतर जीवन जीने के लिए फिट बनाता है, हमारी क्वालिटी ऑफ लाइफ को बेहतर करता है। हम सभी फौजा सिंह जी के बारे में जानते हैं। पिछले वर्ष 100 वर्ष से ज्यादा की आयु में फौजा सिंह जी का निधन हुआ है। खेल के प्रति प्यार हो, फिटनेस हो, ये कैसे जीवन पर्यंत चलता है, फौजा सिंह जी इसकी मिसाल थे। उनका जीवन इस बात की बहुत बड़ी प्रेरणा है कि कैसे स्पोर्ट्स और क्वालिटी ऑफ लाइफ आपस में जुड़े हुए हैं।

साथियों,

स्पोर्ट्स का एक और बहुत बड़ा फायदा होता है, जो असली खिलाड़ी होते हैं, उनमें ड्रग्स, नशे से दूर रहने की इच्छाशक्ति भी पैदा हो जाती है। आज जब नशे की इतनी बड़ी चुनौती युवाओं के सामने है, तो स्पोर्ट्स इसमें भी बहुत सार्थक भूमिका निभाता है।

साथियों,

मुझे खुशी है कि आज भारत में स्पोर्ट्स एक बेहतरीन प्रोफेशन के तौर पर उभरा है। समाज में Sports को लेकर नज़रिया बदला है। आज आप देखिए, हमारे देश में लोग ट्रायाथलोन में हिस्सा ले रहे हैं, 5K और 10K Races दौड़ रहे हैं। यार-दोस्त मिलकर हाय-रॉक्स जैसे चैलेंजेस को पूरा कर रहे हैं। कोई पहली बार शीर्षासन करने की खुशी मना रहा है, तो कोई दोस्तों और फैमिली के साथ मिलकर पिकलबॉल और बैडमिंटन खेल रहा है। ये छोटी-छोटी चीजें हैं, लेकिन अगर इसको एक बड़े नजरिए से देखें, तो इसमें बहुत बड़ा चेंज नज़र आएगा। चेंज ये कि स्पोर्ट्स अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन रहा है। अगर पढ़ाई और करियर का टाइमटेबल बन रहा है, तो दिन भर के रूटीन में स्पोर्ट्स को भी जगह मिल रही है। और यही चेंज है, यही परिवर्तन है, जिसके कारण भारत के स्पोर्ट्स फ्यूचर पर भरोसा भी बढ़ रहा है।

साथियों,

देश में स्पोर्ट्स कल्चर तभी बनता है, जब सामान्य मानवी इससे जुड़े। जब स्कूल्स, स्पोर्ट्स के पीरियड को, को-करिकुलर नहीं, जीवन का हिस्सा मानें। जब ऐसा होता है, तो इससे टैलेंट पूल भी बढ़ता है और स्पोर्ट्स को करियर मानने वाले बच्चों को, उनकी फैमिली का सपोर्ट भी मिलता है। और इसलिए ही मैं कहता हूं, स्क्रीन से ज्यादा, स्पोर्ट्स सेंटर्स की अहमियत है। प्ले-स्टेशन से ज्यादा, प्लेग्राउंड की अहमियत है। और ये तभी होगा, जब आप सब युवा साथी इस अप्रोच को आगे बढ़ाएंगे।

साथियों,

मुझे भारत की युवाशक्ति के सामर्थ्य औऱ उसकी सफलता पर बहुत भरोसा है। मैं देश के हर युवा से कहना चाहता हूं, खेल के मैदान में हो या समाज के बीच, आपकी भागीदारी ही भारत की शक्ति है। आपको खेल से प्यार है, तो इससे जुड़ने के अनेक माध्यम बन रहे हैं। अब नए- नए स्पोर्ट्स इक्विपमेंट्स आ गए हैं, नई टेक्नोलॉजी आ गई है। ट्रेनिंग और कोचिंग के तरीके बदल गए हैं। खेलों के आयोजन की, उसकी प्रतिस्पर्धा की, उसकी विधाओं की जरूरतें बदल गई हैं। इक्विपमेंट डिजाइन है, स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी है, Sports Medicine है, Nutrition है, Psychology, Analytics, ऐसे अनेक क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर बन रहे हैं। आपको ये अवसर छोड़ना नहीं है। इसलिए, इस संवाद में खुलकर अपने ideas सामने रखिए। युवा शक्ति की ये भागीदारी विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत है। एक बार फिर आप सभी युवा साथियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद।

वंदे मातरम्।  

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