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सभी वरिष्ठ महानुभाव,
इसी सप्ताह रमज़ान का पवित्र मास प्रारंभ होने जाने रहा है। मेरी तरफ से भारत के और भारत के बाहर इस विश्व के इस परंपरा को मानने वाले सभी बंधुओं को रमज़ान की बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं। और यह पवित्र त्यौहार मानव कल्याण के लिए हमें मार्गदर्शक बने, मानव कल्याण के लिए शक्तिदायक बने और हम सब सामूहिक पुरूषार्थ से मानव कल्याण के काम को और गति देते चलें। यही मेरी आप सबको शुभकामनाएं हैं।
राजपूत जी मेरे पुराने मित्र है तो कई बार उनसे सत्संग करने मुझे अवसर रहता है। वो एकआध छोटी चीज पकड़कर बहुत सोचते रहते हैं, फिर reference ढूंढते रहते हैं। जिस विषय पर यह किताब आज हमारे सामने है, करीब चार साल पहले गांधी नगर में बहुत लम्बी बातचीत मेरी उनके साथ हुई थी और मुझे अच्छा लगा कि था वो इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं।
हम यह जानते हैं कि 21वीं सदी ज्ञान की सदी है। और विश्व का इतिहास कहता है कि जब-जब मानव जाति ज्ञान युग से गुजरी है तब-तब भारत ने नेतृत्व किया है। 21वीं सदी ज्ञान की सदी है तो भारत की सर्वश्रेष्ठ जिम्मेदारी भी है। और उस जिम्मेदारी को निभाने के लिए ज्ञान यह सहज हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। कभी-कभार में सोचता हूं कि शायद ही दुनिया में भारत के नागरिक को जो सौभाग्य मिला है, वो सौभाग्य शायद ही दुनिया के किसी नागरिक को मिला है, जो हमें मिला है। और वो सौभाग्य यह है कि इसी भू-भाग में अपने ही जैसे लोगों के बीच रहते हुए, अपनी ही भाषा बोलने वालों के बीच रहते हुए भिन्न-भिन्न परंपराओं को समझने का अवसर, भिन्न-भिन्न पंथ, संप्रदाय, उपासनाओं को समझने का अवसर, भिन्न-भिन्न प्रकार की सोच को किस प्रकार से जीया जाता है, उसको अनुभव करने का अवसर – शायद ही दुनिया में किसी बालक को मिलता होगा, जो हमें मिलता है। और जितना खुलापन होता है, उतनी ही पहचान निकट बन जाती है।
लेकिन दुर्भाग्य है कि जब तक यह खुलापन था, जब तक यह अपनापन का माहौल था, हम बहुत शक्तिशाली थे। लेनिक जब हम छोटे-छोटे दायरों में बंध गए, अपने में सीमित हो गए और न देखना, न जानना, न समझना, न पहचानना, अपने में ही खोते गए, हमने अपने ही विकास के रास्तों के दरवाजे बंद करते चले गए। यह किताब उस दिशा में हमें एक मार्गदर्शक बनती है कि कुछ खोलो, देखो तो सही। उनको भी तो समझो, उनकी भी तो सोच देखो, वे भी कुछ सोच रहे हैं। और understanding each other यही तो हमारे लिए meeting point का सेतू बनता है। मैं समझता हूं यह सकंलित किताब उस बात के लिए परिचायक है, उपकारक है, और उसके लिए मैं सिराजूद्दीन जी का भी और राजपूत जी का भी अभिनंदन करता हूं उन्होंने यह प्रयास किया है।
हमारे देश में किसी भी संप्रदाय की बात करो, हर सम्प्रदाय में जहां तक मैं इस भू-भाग की बात करता हूं, और वैश्विक रूप में भी देखे तो भी, ज्ञान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। हमारे यहां ब्रह्मसूत्र की चर्चा अगर करें तो उसमें ब्रह्म ज्योति की कल्पना की है। हमारे यहां अगर गीता के संदर्भ में देखे तो ज्ञान को “दिव्यज्योति” के रूप में प्रचलित किया गया है। अगर गुरूग्रंथ साहब को देखे तो उसमें “चांदना” की चर्चा आती है। बाइबल को देखे तो “Divine Light” की बात आती है और कुरान को देखे तो “खुदा का नूर” यह शब्द आता है। इन सभी चीजों में एक एक चीज common है – ज्ञान प्रकाश देता है, ज्ञान प्रकाशपथ देता है, ज्ञान मंजिल की ओर जाने की राह देता है। और इसलिए, हमारे यहां, हमारे शास्त्रों में इस बात को कहा गया है। और हर समाज ने इसकी उपासना की है।
मुझे याद है 1894 में, यानी हम कल्पना कर सकते हैं। अहमदाबाद में एक Mohammedan Education Seminar हुआ था और पूरे देश का हुआ था – 1894 और उसको host किया था एक उमियाशंकर लाभशंकर नाम के हिंदू ने। और मिल बैठकर चर्चा इस बात की थी कि आने वाली शताब्दियों में हमारी शिक्षा कैसी हो, परंपरा कैसी हो। और आपको आश्चर्य होगा कि उस Mohammedan Education Society को जो seminar हुआ था, उसमें एक हिंदू ने प्रस्ताव रखा था, जिसको सर्वसम्मति से माना गया था – वो प्रस्ताव यह था कि मुस्लिम कन्याओं की शिक्षा के संबंध में हम सबकी दायित्व है पूरा करना चाहिए। 1894! यानी जागरूकता उस समय भी कितनी थी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
कुरान में सबसे ज्यादा बार अल्लाह का नाम है। लेकिन अल्लाह के बाद पूरे कुरान में एक शब्द बार-बार आता है जो second highest मैं कह सकता हूं अल्लाह के बाद – वो आता है “इल्म”। 800 बार, जैसे हमारे एक मित्र मुझे बता रहे थे 800 बार कुरान में इल्म शब्द को उपयोग है। यानी अल्लाह के बाद सबसे ज्यादा अगर किसी बात की चर्चा है तो इल्म यानी शिक्षा की है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हमारे यहां यह जो बातें आज हम कर रहे हैं वो कोई नई नहीं है। हमें कहा गया दुर्भाग्य है कि हम भूल गए हैं। अगर हम इन बातों को याद कर लें तो कोई नए रास्ते खोजने की जरूरत भी नहीं है। और इसलिए शिक्षा के महात्मय का… आपमें से जो लोग गुजरात विद्यापीठ का logo देखा होगा तो बड़ा आश्चर्य होगा आपको। 1920 में महात्मा गांधी ने गुजरात विद्यापीठ को प्रारंभ किया। उस गुजरात विद्यापीठ को प्रारंभ किया है उसका जो logo बना है, उसमें एक संस्कृत वाक्य है जो बहुत प्रचलित है – “सा विद्या या विमुक्तये”, लेकिन उसी के अंदर उस logo में Arabic घोष वाक्य भी है। बहुत कम लोगों का ध्यान या होगा और उस घोष वाक्य बड़ा मजेदार है। उसमें लिखा है “al hikamato zallatual monimine fahaiso uajedaha ahakko leha” इसका मतलब होता है ज्ञान मुसलमानों की खोई हुई चीज है। वो जहां से भी मिले उसको पाना यह मुसलमान का हक है। गांधी जी ने 1920 में फिर से एक बार शिक्षा की ओर चलो, फिर से एक बार ज्ञान की उपासना कि ओर आगे बढ़ो, इसकी चर्चा की थी।
हमने भी देखा है कि अलग-अलग समाज के अलग-अलग प्रकार के नेतृत्व होते हैं। कुछ समाज में ऐसे लोग पैदा होते हैं, छोटा-सा मानो समाज हो जिनको सेवा भाव में रस होता है। मुखिया होते हैं जाति बिरादरी के सेवा भाव करते हैं। तो समाज में भी उनका जय-जयकार होता है वो जीत हैं तब तक बीमार को दवाई देते हैं, भूखे को खाना देते हैं। पीने वाले को पानी देते हैं तरह-तरह के सेवा भाव करते हैं। कुछ लोग होते हैं जो समाज के अंदर राजनीतिक नेतृत्व के लिए अपनी गोटी बैठाते रहते हैं। समाज को जोड़ना वो भी राजनीति के लिए, समाज से मिलना वो भी राजनीति के लिए समाज को एकत्र योजना वो भी राजनीति पाने के लिए और खुद कुछ पाने के लिए बन जाते हैं, समाज वहीं का वहीं रह जाता है। कुछ समाज में ऐसे व्यक्ति होते हैं कि मैं तो बड़ा उद्योग लगाऊंगा और मेरे ही समाज के बच्चों को रोजी-रोटी मिलेगा तो वो काम कर लेता है और एकाध पीढ़ी का भला करके चला जाता है।
लेकिन कुछ समाज ऐसे होते हैं जिसमें एकाध दो व्यक्ति ऐसे पैदा होते हैं जो शिक्षा में अपना जीवन खपा देते हैं। और मैं कह सकता हूं इन सब प्रकारों में जिन्होंने शिक्षा में अपना जीवन खपा दिया है वो समाज 100 साल के भीतर-भीतर इतना ओजस्वी-तेजस्वी बन जाता है उसे कभी किसी चीज की जरूरत नहीं पड़ती है। और ऐसे मैने बहुत बारीकी से इन चीजों का अध्ययन किया है। समाजों का पिछड़ापन भी अगर गया है तो शिक्षा से गया है। परिवार का पिछड़ापन गया है तो भी शिक्षा से गया है। अंधश्रद्धा से मुक्ति मिली है तो भी शिक्षा से मिली है। कुप्रथाओं से मुक्ति मिली है तो भी शिक्षा से मिली है और इसलिए अगर हमें जीवन को समयानुकूल बनाना है, या जीवन को समय से आगे चलने वाला बनाना है तो शिक्षा के अलावा और कोई मार्ग नहीं है। और इसलिए शिक्षा के जितने भी प्रयास हों वो आवश्यक है।
मैं पिछले दिनों… यहां SAARC देशों के सभी हमारे साथी बैठे हैं, मेरी कोशिश है कि SAARC देशों में अपनापन एक-दूसरे में जानी-पहचानी बातें बहुत हैं, कोई inject पड़े ऐसा नही है जो व्यक्ति पाकिस्तान में बैठकर सोचता होगा, जो हिंदुस्तान में सोचता होगा, जो बांगलादेश में सोचता होगा श्रीलंका में सोचता होगा। 19-20 का फर्क हो सकता है ज्यादा फर्क नहीं हो सकता है। क्योंकि हम एक ही ढ़र्रे से निकले हुए लोग हैं क्या हम SAARC देशों में शिक्षा को एक शक्ति के रूप में उभार सकते हैं? उसी विचार में से यहां पर SAARC यूनिवर्सिटी शुरू हुई है। और जब अभी हम नेपाल में बैठे थे तो मैने आग्रह किया है कि SAARC की यूनिवर्सिटी की एक-एक ब्रांच सभी SAARC देशों में क्यों न हो? ताकि हमारे सभी pillars पर हमारी शिक्षा की व्यवस्था और SAARC यूनिवर्सिटी से जो नागरिक तैयार होगा एक प्रकार से SAARC psyche citizen बनेगा। और अगर SAARC psyche citizen बनता है तो मैं मानता हूं हमारे अपनेपन की नई नींव बन जाता है। लंबे अरसे से इतना बड़ा प्रभाव चलता है इसकी ताकत कुछ नजर आती है। हम उस दिशा में प्रयत्नरत हैं।
अशिक्षा कितना बड़ा नुकसान करती है! कभी-कभार जब सुनते हैं कि हम पोलियो का खुराक नहीं खाएंगे। आज भारत पोलियो से मुक्त हुआ। लेकिन मुझे पीड़ा है कि मेरे पड़ोस पाकिस्तान में भी पोलियो की आज भी तकलीफ है, बंग्लादेश में है, हमारे पड़ोस में है। क्या हम सभी का दायित्व नहीं हैं कि हमारे सब पड़ोसियों को भी पोलियो से मुक्त करें? और ये हम सबका सामुदायिक दायुत्व बनता है। और भारत इस भूमिका को निभाने के लिए हर पल कोशिश कर रहा है।
हमने SAARC satellite की बात कही। SAARC satellite के पीछे इरादा क्या है? SAARC देशों में ज्ञान सहज रूप से उपलब्ध हो। SAARC satellite के माध्यम से knowledge, health care, मौसम की जानकारियां – हमारी अपनी शक्ति हो जो हमारे अपने आप में शक्ति के रूप में उभरे। उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि अगर 21वीं सदी एशिया की सदी है, अगर SAARC के हम देश के लोग बिखरे रहेंगे, तो हम 21वीं सदी जब हमारे दरवाजे पर खड़ी होगी, वैभव चारो तरफ दिखता होगा – लेकिन हम शायद उसको पाने के लिए भाग्यवान नहीं होंगे। और इसलिए SAARC की एकता, SAARC का सामर्थ्य SAARC की शिक्षा, SAARC का आरोग्य, SAARC का agriculture – इन सभी बातों पर बल देते हुए हम आगे बढ़ना चाहते हैं।
मैं अभी बांग्लादेश गया था, मेरा इतना उत्तम अनुभव रहा कि कितने साथ मिलकर काम कर सकते हैं, हम कितने ताकत के साथ नई ऊंचाईयों को पार कर सकते हैं। देश आजाद हुआ तब से एक समस्या अटकी हुई थी – बंग्लादेश की सीमा की – देश आजाद हुआ है तब से! संसद में सभी दलों ने मिल करके उस समस्या का संविधान कर दिया। सर्वसम्मति से हो गया और मैंने देखा उसका असर बांग्लादेश के हर चेहरे पर मुझे नजर आ रहा था।
हम मिल बैठ करके हम नई ऊंचाईयों पर नई क्षेत्र में ले जाने के लिए प्रयास करना चाहें तो उसमें शिक्षा एक बहुत बड़ी ताकत है। हम कितने ही विचारों से बंधे हुए क्यों न हों लेकिन अगर हम आधुनिकता की ओर जाने से इंकार कर देंगे तो दुनिया हमारा इंतजार नहीं करेगी। हम वहीं के वहीं रह जाएंगे, जगत चलता रहेगा। जब Industrialization हुआ, औद्योगिक क्रांति हुई पूरे विश्व में, तब ये भूभाग गुलाम था। हम उसका फायदा नहीं उठा पाए। आज IT Revolution का युग है। हम स्वतंत्र हैं सामर्थ्यवान भी हैं। हम इस IT Revolution का लाभ कैसे उठाएं? ये सब ज्ञान से जुड़ी हुई बातें है, शिक्षा से जुड़ी हुई बातें हैं। उसको अगर हम ले करके चलते हैं तो मुझे विश्वास है कि हम एक बहुत बड़े बदलाव की ओर बहुत बड़ी सिद्धियों कि ओर आगे बढ़ सकते है।
मुझे विश्वास है कि यह ग्रंथ understanding each other, उसके लिए और शिक्षा की परंपरा और शिक्षा की महात्मय उसको जरूर एक नई दिशा देगा। आप सबसे मुझे मिलने का अवसर मिला। मैं सिराजूद्दीन जी का और राजपूत जी का आभारी हूं। मैं फिर एक बार सबको बहुत शुभकामनाएं देता हूं।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
Released the book, “Education of Muslims: An Islamic Perspective of Knowledge and Education – Indian Context” http://t.co/DlopeKEb8s
— Narendra Modi (@narendramodi) June 15, 2015