पीएमइंडिया
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज वीडियो संदेश के माध्यम से श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी महाराज की 500वीं पुस्तक के विमोचन के दौरान अपना उद्बोधन दिया। सभा को संबोधित करते हुए, श्री मोदी ने कहा कि इस पावन अवसर पर वह सर्वप्रथम पूज्य भुवनभानुसूरीश्वर जी महाराज के चरणों में प्रणाम करते हैं और प्रसांतमूर्ति सुविशाल गच्छाधिपति पूज्य श्रीमद विजय राजेंद्रसूरीश्वर जी महाराज, पूज्य गच्छाधिपति श्री कल्पतरुसूरीश्वर जी महाराज, सरस्वती कृपापात्र परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद विजयरत्नसुंदरसूरीश्वर जी महाराज और उपस्थित सभी साधुओं और साध्वियों को नमन करते हैं। उन्होंने इस समारोह में ऊर्जा महोत्सव समिति के सभी सदस्यों को अभिनंदन किया और बधाई दी।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज सभी को श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी महाराज की 500वीं पुस्तक के विमोचन के पुण्य भागी बने हैं। उन्होंने ज्ञान को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवन में उतार कर दिखाया है। उन्होंने कहा कि महाराज का व्यक्तित्व संयम, सरलता और स्पष्टता का अद्भुत संगम है; जब वे लिखते हैं, तो शब्दों में अनुभव की गहराई होती है। जब वे बोलते हैं, तो वाणी में करुणा की शक्ति होती है और जब वे मौन होते हैं, तो भी मार्गदर्शन मिलता है। उन्होंने कहा कि महाराज की 500वीं पुस्तक का विषय, ‘‘प्रेमनु विश्व, विश्वनो प्रेम,’’ यह शीर्षक अपने आप में ही बहुत कुछ कहता है और उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि समाज, युवा और मानवता इस रचना का लाभ उठाएंगे। उन्होंने कहा कि यह विशेष अवसर और ऊर्जा महोत्सव जन-जन में एक नई विचार ऊर्जा का संचार करेगा और सभी को हार्दिक बधाई दी।
प्रधानमंत्री ने कहा कि महाराज की 500 रचनाएं एक ऐसा विशाल सागर है जिसमें भांति-भांति के विचार रत्न समाहित हैं। ये रचनाएं मानवता के समक्ष चुनौतियों के सरल और आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि समय और परिस्थितियों के अनुसार, ये विभिन्न ग्रंथ मार्गदर्शक प्रकाश का काम करेंगे। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों और पूर्व आचार्यों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत प्रेम, सहिष्णुता और सद्भाव के साथ, इन रचनाओं में आधुनिक और समकालीन उपदेश देखे जा सकते हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विशेष रूप से आज, जब विश्व विभाजन और संघर्ष से जूझ रहा है, तब “प्रेमनु विश्व, विश्वनो प्रेम” की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यह मात्र एक पुस्तक नहीं बल्कि एक मंत्र है, जो प्रेम की शक्ति का परिचय देता है और उस शांति और सद्भाव का मार्ग दिखाता है जिसकी विश्व को तलाश है।
श्री मोदी ने जैन दर्शन के मार्गदर्शक सिद्धांत ‘‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’’ का उल्लेख किया, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक जीवन दूसरे से जुड़ा हुआ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब हम इस सूत्र को समझते हैं, तो हमारा दृष्टिकोण व्यक्ति से हटकर सामूहिक हित की ओर मुड़ जाता है, और हम व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र और मानवता के लक्ष्यों के बारे में सोचने लगते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि इसी भावना के साथ वे नवकार मंत्र दिवस में शामिल हुए थे, जहां चारों संप्रदाय एक साथ आए थे, और उस ऐतिहासिक अवसर पर उन्होंने नौ आग्रह किए थे और नौ संकल्प लिए थे। उन्होंने आज उन्हें दोहराया: पहला संकल्प जल संरक्षण का, दूसरा ‘‘एक पेड़ मां के नाम’’ का, तीसरा स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ाने का, चौथा स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने का, पांचवां भारत दर्शन को अपनाने का, छठा प्राकृतिक कृषि को अपनाने का, सातवां स्वस्थ जीवनशैली का पालन करने का, आठवां योग और खेलों को जीवन में शामिल करने का और नौवां गरीबों की सहायता करने का संकल्प।
श्री मोदी ने जोर देते हुए कहा, “भारत आज विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है, जहां के युवा एक विकसित भारत का निर्माण कर रहे हैं और साथ ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत कर रहे हैं।” उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस परिवर्तन में महाराज साहब जैसे संतों का मार्गदर्शन, उनका साहित्य और उनके वचन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री ने एक बार पुन: आभार व्यक्त करते हुए महाराज साहब की 500वीं पुस्तक के लिए शुभकामनाएं दी और विश्वास व्यक्त किया कि महाराज के विचार भारत की बौद्धिक, नैतिक और मानवीय यात्रा को प्रकाशित करते रहेंगे।
PM @narendramodi‘s message during the release of Shrimad Vijayaratna Sunder Surishwarji Maharaj’s 500th book. https://t.co/5QrcO8oGc6
— PMO India (@PMOIndia) January 11, 2026
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