PMINDIA
उपस्थित सभी महानुभव,
31 अक्तूबर से इस अभियान का प्रारंभ हुआ एस सप्ताह के लिए, सरदार साहब की जन्म जयंती से प्रारंभ हुआ है। और इस बार इस अभियान में जन सामान्य को भागीदार बनाने का प्रयास हुआ है। ये बात हम सब जानते हैं कि कुछ तो कारण होगा कि 1964 में किस व्यवस्था को जन्म दिया गया। उसके पहले शायद जरूरत नहीं लगी होगी फिर और भी कुछ कारण होंगे कि 2004 में एक नहीं तीन चाहिए वरना कुछ गड़बड़ होता है। इसलिए 3 member हो गए। और हम सब जानते हैं कि आज से पचास साल पहले जो लोग यहां उस उम्र के हैं। पचास साल पहले कहीं ऐसा बोर्ड पढ़ने को नहीं मिलता था, ‘शुद्ध घी की दुकान’ बड़े से ही रहता था ‘घी की दुकान’। मान लिया जाता था वो ‘शुद्ध’ ही है। लेकिन अब बोर्ड लगाना पड़ता है ‘शुद्ध घी की दुकान’।
समाज जीवन में मूल्यों का ह्रास कैसे होता है और चिंता सबसे ज्यादा तब होती है, जब समाज जीवन में मूल्यों का ह्रास होता है। हम सब जानते हैं आज से पचास साल पहले भी कुछ तो विद्यार्थी ऐसे रहते होंगे जो नकल करते होंगे चोरी करते हुए बगल वाले को देखते होंगे, होंगे ही, लेकिन वो उस काम को भी बड़े संकोच से करता था, डर से करता था, ये भी भरपूर कोशिश करता था कि किसी को पता नहीं चले कि मैं ये कर रहा हूं। मूल्य ऐसे बदल गए कि student चाकू रखता है और बाहर आकर कहता है, कौन Supervisor है, मैं देखता हूं। मैं तो पूरी नोट लेकर के बैठ गया था लिख लिया। ये जो मूल्यों में ह्रास है, जब वो virtue बनने लग जाता है, नहीं नहीं! कहता है, ऐसा ही होता है सर, भई ये तो काम ही ऐसा है इसमें क्या है, ये तो होता ही है। तब बड़ा संकट पैदा होता है।
भारत के सामने और हम जैसे गरीब देश को ये corruption की luxury रास नहीं आ सकती जी गरीब फिर से। पूछीए लोगों के जेब में सब चला जाए तो सामान्य मानवी उसके हक तक कब पहुंचेगा। और कभी कभार सवाल रुपयों का नहीं होता है, सम्मान को भी होता है। एक इंसान की मजबूरी है उसके कारण उसको ये करना पड़ रहा है। और ये सारी स्थितियों को बदलने के लिए जन चेतना, सतर्कता, सामान्य मानवी का consciousness level इसको टटोलना हर पल आवश्यक होता है। और तब जाकर के इस प्रकार के अभियानों से हम उस शक्ति को जुटा पाते हैं ज्यादा से ज्यादा हमारे सपनों को पूरा करने के लिए काम आता है। और हम सब जानते हैं कि इस खेल में जो खेलने के आदि होते हैं, वो बड़े समर्थ होते हैं। बहुत Capable होते हैं। अगर performance vice देखो, तो दस अफसरों में सबसे ज्यादा अच्छा perform करने की ताकत उसी में होती है। और इसलिये सरकार में बैठे हुए लोगों को जानते हुए भी काम उसको देना पड़ता है, क्यों क्योंकि वो perform करता है। इसका मतलब ये हुआ कि इस प्रकार के आचरण को जिनको आदत लगी है, इनमें Creativity भी बहुत होती है जी। अद्भुत Creativity के वो मालिक होते हैं। वो ऐसी जगह से खोज लाते हैं हां यहां से हो गया। हम सोच भी नहीं सकते।
हम छोटे थे तो चुटकुला सुना करते थे। चुटकुला ही होगा। यहां रेलवे वाले बैठे हैं कहीं बुरा न मान जाएं। वो रेलवे के मुलाज़िम थे। और बड़े corruption में माहिर थे। और बड़े मास्टर थे वो। अफसर भी तंग आ गए थे उनसे। ये इसके कारण हमारा ये विभाग बदनाम होता रहता है। इसकी कोई दवाई करनी चाहिए। आखिरकार तय किया कि ठीक है। इसको रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का जो आवा-गमन का जो announcement है, वो duty दें। और कोई ड्यूटी नहीं। उसका काम यही होगा कि वो mouth-piece में बोलेगा इतने बजे ये ट्रेन आएगी इतने बजे ये ट्रेन जाएगी। और ये सबको लगा कि ये बड़ा बहुत ही लोगों को लूटता रहा है ठीक हुआ है। उसको बैठाया .. कोई परेशानी नहीं वो बड़ा Creative था। बहुत ही Creative, उसको जैसे ही काम मिल गया उसने शुरु कर दिया। ट्रेन आते ही कि इस size का बैग उठाना है, तो पांच रुपया लगता है। इस साइज के बैग उठाना है तो दस रुपया लगता है। अगर luggage में तीन चीजें हैं तो कितना लगता है। सारे जो कुली थे वो इक्कठे हुए। ये तो मरवा देगा। अब passenger पैसा नहीं दे रहे, देख जरा वो बोल रहा है। पांच रुपये ले ज्यादा नहीं दूंगा। तो सारे कुली इक्ट्ठे होकर उसके पास गए। कहे भाई उसने कहा पक्का करो सौदा। हम अपाने कभी ऐसी Creativity सोची है क्या। हां मुझे पता है कि Vigilance Commission कैसे टूटेगा इसको। वे बड़े माहिर होते हैं जी।
और इसलिए हर पल सतर्कता बरतें और मैंने देखा है जी। ये अपने कामों में बड़े सत्यनिष्ठ होते हैं। उसूल के बड़े पक्के होते हैं सही होते हैं। मेरा अपना अनुभव है। शायद इस समय (व्यावधान), तीसरी पट्टी रहती थी। शायद उस समय की बात है। मुझे अहमदाबाद से दिल्ली जाना था। और उस समय शायद एक ट्रेन चलती थी 24 – 25 घंटे में पहुंचाती थी। दिल्ली मेल या फिर ……मुझे याद नहीं…तो हम स्टेशन पर गए, हम तो फ़कड़-गिरधारी थे। हमें तो क्या करना हमें तो ऐसे ही unreserved coach में चढ़ जाना। लेकिन वहीं प्लेटफार्म पर हमारे परिचित मिल गये। बोले कहां जा रहे हो मैंने बोला भई जरूरी काम आ गया है, तो दिल्ली जाना है। बोले आइए मैं बैठा देता हूं। मैंने कहा कि मेरे पास तो टिकट है, लेकिन reservation नहीं है भई। मैं तो ऐसे ही वो general boggy में चढ़ जाऊंगा अपना पहुंच जाऊंगा मैं। नहीं बोले मैं बात करता हूं। क्योंकि वो परिचित तो थे। तो किसी Ticket-Checker को पकड़ते हुए के भई ये हमारे परिचित हैं और समाज सेवा का काम करते हैं। इनको दिल्ली जाना है तो एक berth मिल जाए तो अच्छा होगा। समाज के लिए काम करते हैं। तो वे बोले साहब आईये आईये आप जैसे समाज सेवक हैं आईये। हमको ले गये अंदर एक जगह में बैठा दिया ऐसा Reserve Coach है आबू स्टेशन .. आबू रोड, मैं बार-बार उनके पास गया कि मैं थोड़ा कांप रहा था कि भई मेरे पास reservation नहीं है मैं अंदर बैठ गया हूं। मैं उनके पास जा रहा था कि भई मुझे berth दे दीजिये मैं पैसे मेरे टिकट काट दीजिए, ताकि मेरा उन्होंने कहा कि चिंता मत करो भई मैं हूं। मैं आबू आ गया लोग सोने की तैयारी कर रहे थे। मैं उनके पास गया मैंने कहा भई आप बताइये वरना मैं उतरकर पीछे चला जाऊं, वो क्या कहेंगे। उन्होंने कहा भई तुम चिंता मत करो आबू रोड पे नया Ticket-Checker आएगा। मेरी ड्यूटी आबू रोड तक ही है। मैं उसको तुम्हें शुभ परिचय करवा दूंगा। और वो तुम्हें टिकट दे देगा। मैंने कहा भई वो मुझे कहां पहचानेगा आप मुझे दे दीजिये। नहीं, बोले मेरा उसूल है। मैं बिना पैसे काम करता ही नहीं हूं। अब तुमको एक ऐसे व्यक्ति ने परिचय करवा दिया है कि मैं तेरे से पैसा ले नहीं सकता हूं। तो मैं अगले वाले को hand-over कर देता हूं। वो बिना पैसे तुम्हें जरूर जो भी टिकट है या दे देगा। साहब उसूल का ऐसा पक्का इंसान कभी देखा है क्या? ये, ये जो अवस्था है, हम सब इसके भुग्त-भोगी जरूर हैं। कहीं न कहीं परेशानी, हम पद पर होंगे तो भी। आप इस पद पर होंगे उसको पता है कि आप इस पद पर हो, वो कहता है कि अभी मैं इस पद पर हूं, मेरा ये हक बनता है, दे दो। इसके बाद जब मैं तुम्हारे पास आऊँ, तुम ले लेना। यहां तक कह देते हैं।
ये स्थिति है लेकिन सामान्य मानवी हमारे देश का ईमानदार है। उसके लिए मजबूरन कुछ करना पड़ता है। और इसलिये अगर हम संकल्प करके ये सामान्य मानवी को नजर में रखें, अनुभव यह है कि वो कष्ट झेलने को भी तैयार रहता है जी, उसे दिक्कत नहीं है। तकलीफ आएगी तो सहने को तैयार है। लेकिन उसका भरोसा बढ़ना चाहिए। किसी अच्छाई के लिए कुछ हो रहा है। अगर एक बार भरोसा बढ़ जाता है तो वो हमें पूरा सहयोग देता है। अगर उसे पता हो भई हां ठीक है, नियम और कानून से मुझे देना है, उसको कोई दिक्कत नहीं है। हम ये विश्वास कैसे दिलाएं। अब ये बात सही है कि सबसे बदनाम बिरादरी हमारी जो है इस सारे कार्यकल्प में वो मेरे वाली है। देश में किसी से पूछे सबसे ज्यादा corrupt लोग कौन लोग हैं, तो हमलोगों का नाम आता है, राजनेताओं का। और ऐसा नाम बड़ा बन गया है कि उसके पीछे सब लोग सब कुछ कर सकते हैं। दिखता वो है पीछे सब होता है। अब ये perception भी सामान्य मानवी को लगने लगा है। छोड़ो यार सब चोर है। ये निराशा का माहौल सामान्य व्यक्ति को इस शुचिता के अभियान से डरा देता है।
मैंने सुना है मैं थोड़ा पूछ रहा था अभी। मैंने कहा ये पंचनामा शब्द हिन्दी में है क्या, वो बता रहे थे हां है। आपने देखा होगा, कोई भी घटना होती है उसमें पंचनामा होता है। आपने कभी mark किया है क्या? अगर अफसर ये है, तो पंच यही होते हैं। Permanent पंच। वही अफसर वो काम करेगा तो भी पंच वही होंगे। क्या हमने Verify किया है क्या कि ये कुम्बा साथ – साथ कैसे चलता चला जाता है। इसकी transfer हो गई तो क्या पंच की भी transfer हो गयी क्या? क्या हम उन पंचनामा में जो पंच लाते हैं, जिसको हम समाज के अच्छे नागरिक मानकर के लाते हैं, क्या AADHAR Number से ये Verify हो सकता है क्या? कि एक ही AADHAR Number वाला इतनी जगह पर पंच बनकर के गया है। और बाद में Court में बदल जाने के लिए क्या-क्या लेता है। उसकी Telephone record क्या है, किसके contact में था वो? हम व्यवस्थाओं को एक –एक चीज को इस प्रकार से पकड़ने की कोशिश करेंगे। सबका ध्यान बढ़ रहा है, सबको मालूम है ये …। हम इन चीजों को बदल सकते हैं। Technology बहुत बड़ी मदद कर सकती है।
इन दिनों आपने देखा होगा। मैं एक दिन हिसाब लगा रहा था। अभी तो आंकड़े बहुत आगे गये होंगे। सिर्फ AADHAR Number से Direct Benefit Transfer को बल दिया। कुछ तो अभी वीडियो में दिखाया जा रहा था। मैंने हिसाब लगाया 36 हजार करोड़ रुपया बचत हुई है। जो कि कहीं और जाते थे इसका मतलब ये नहीं कि हमने 36 हजार करोड़ सरकार के खजाने में रख दिया है। उसको सही जगह पर हमने divert किया है। अगर वो न होता तो वो पैसे किसी के जेब में जाते। यानिके हम Technology का भरपूर उपयोग करें भरपूर उपयोग करें। Transparency लाने में, Checks & Balances में ये बहुत बड़ी अहम भूमिका अदा कर सकता है। कभी कभार हमारे यहां जो silo type activity है उसके कारण एक कानून या एक व्यवस्था का लाभ दूसरे कानून या दूसरी व्यवस्था को नहीं मिलता है। और उसके कारण भी लोग परिस्थित का फायदा उठाते हैं। आप हैरान होंगे कुछ ऐसे जागरूक लोग हैं कि जो इतने प्रकार की scholarship लेते हैं। और आपको लगता है कि आप एक को दे रहे हैं। हकीकत में एक ही व्यक्ति को आठ जगह से पहुँचती है। जब AADHAR से Verify किया तो ध्यान में आया कि इस category का भी ये फायदा उठाता है, इस category का भी ये फायदा उठाता है, इस category का भी ये फायदा उठाता है और दूसरे सात जो हक वाले थे, वो रह जाते हैं। अगर हम व्यवस्था को Technology के माध्यम से अगर जितना ज्यादा ठीक कर पाएंगे, तो संभावना है कि हम सामान्य मानवी की जो हक की चीजें हैं उसको शायद देने में सफल हो जाएंगे।
मैं जब एक बार देख रहा था, चंडीगढ़ में… चंडीगढ़ में by and large …के एक स्तर के ऊपर के लोग बसते हैं। जिनके घर में Gas का connection है, जिसके घर में बिजली है। फिर भी चंडीगढ़ को तीस लाख लीटर कैरोसीन का कोटा है। मुझे बताइये तो कहां जाता है वो। तो हमने कहा जरा देखो भाई जरा बारीकी से देखो तो उन्होंने आधार, Gas Connections, बिजली बिल इन सबको Technology से सबको telly किया, तो ध्यान में आया कि सिर्फ पांच हजार परिवार ऐसे थे कि जिनको अगर Gas Connection दे दिया जाए तो चंडीगढ़ को सौ ग्राम कैरोसीन की जरूरत नहीं पड़ेगी। सरकार ने अभियान चलाया। उनको Gas Connection दे दिया। आज चंडीगढ़ में तीस लाख लीटर कैरोसीन जो जाता था, बंद हो गया। जो कहीं डीज़ल के लिए Black Market में बिकता था। अब हम चोरों को पकड़ने के लिए कितने ही कमेटियां बना लेते तो पता नहीं कब पहुंच पाते। लेकिन हम एक ऐसे solution की तरफ चलते हैं तो हम स्थितियों को बदल सकते हैं।
हम सबको मालूम है नौकरी पाने के लिए लोगों को क्या कुछ नहीं करना पड़ता। और मां-बाप को भी लगता है कि कुछ भी हो एक बार Government में घुस जाए। ड्राइवर के रूप में जाए, peon के रूप में जाए, कुछ भी, एक बार अंदर गया फिर तो बस बाकि तो वो अपना कर लेगा। ये विश्वास है माँ-बाप को। ये ऐसी जगह है कि बाकि अपना कर लेगा। बहुत से लोग हैं बेटी की शादी करनी है तो यार देखो PWD वाला क्लर्क-वलर्क मिल जाता है क्या। ये समाज का जो perception बना हुआ है। हमने आकर के फैसला किया कि भारत सरकार में वर्ग तीन और चार, No Interview. अब मुझे बताइए साहब ये Interview वाली क्या काम है। हम क्या इतने बड़े महान experts है क्या कि तीस सैकेंड में तय कर लेंगे कि हां ये अच्छा है या बुरा। ये Interview होता है, तीस सैकेंड से ज्यादा मैं नहीं मानता ये उम्मीदवार को मिलता होगा। ये वर्ग तीन और चार में। इसका मतलब नौकरी किसको मिलती है जिसकी कोई सिफारिश करने की व्यवस्था हो। सिफारिश कहां से होती है। सिफारिश via जेब होती है। हमने कहा भई चलिए हो सकता है पांच-दस परसेंट ऐसे लोग आएँगे। जिसकी इस काम के लिए भी क्षमता नहीं है। लेकिन कम से कम बुराइयों से तो हम व्यवस्था को बचा सकते हैं। और आज भारत सरकार ने वर्ग चीन और वर्ग चार Interview की परम्परा समाप्त कर दी। उसके merit के आधार पर देखो भई जो top के हैं। उनको एक बार ले लो। गरीब विधवा मां के घर में जब बेटे के order का कागज आ जाएगा, उसको संतोष हो जाएगा। ये संभव है, ये संभव है।
दूसरा सरकार में secrecy नाम की कोई चीज है, वो भी कभी-कभी बड़ा खतरा बन जाती है जी। कोई कानून हम ला रहे हैं। ऐसा secrecy maintain करते है यानी एक chamber से दूसरे chamber, department का होगा फाइल उसको भी पता नहीं चलने देंगे। कोई आएगा तो बंद कर देते हैं। मैंने कहा क्यों भई? हमने कहा ये draft जितने भी हैं, वो public domain पर रख दो। let the people debates, interested group मैदान में आएंगे। वो कहेगा साहब ये गलत कर रहे हो, दूसरा कहेगा नहीं ये गलत कर रहे हो, तीसरा कहेगा ये गलत। ये अगर होता है, तो कम से कम draft तो ठीक बनेगा। हमारे इन दिनों आपने देखा होगा कि भारत सरकार ऐसे जो भी कानून के लिए सोचता है, उसकी draft copy online करने का आग्रह रखा है। और उसका परिणाम यह हो रहा है कि सभी interested groups अपना input देते हैं। उसके दो फायदे हैं। कोई vested interests कारण से कोई रचना हो रही वो अटक जाती है। और दूसरा कभी ईमानदारी से भी ध्यान में आते हैं दो-चार पहलु छूट जाते हैं। public के input के कारण वो छूटे हुए पहलु भी incorporate होते हैं। और कुल मिलाकर के एक आवश्यक योग्य कानून की दिशा में हम कदम बढ़ा सकते हैं। उस दिशा में हमने कदम उठाए उसका positive लाभ मिलता है। तीसरा मैंने देखा है कि इस समस्या की जड़ में एक बीज है। वो है discrimination. हम जब नियम बनाते हैं जिसमें ambiguity रहती है। इसका अर्थ यह भी हो सकता है, इसका अर्थ यह भी हो सकता है। फिर तो वो corruption के लिए द्वार खोल देता है। और इसलिए State policy driven होना चाहिए। Individual के बीम के आधार पर
State नहीं चलना चाहिए। State, policy driven है, तो Ifs & Buts के लिए बहुत सी सीमा मर्यादाएं आ जाती हैं। और जहां पर Ifs & Buts नहीं होते हैं, वहां discrimination के लिए किसी को scope नहीं रहता है। Black & White में घर बैठे हुए कह सकता है ये मेरा हक है ये मेरे काम का नहीं है मुझे नहीं मिल सकता। मुझे जाने की कोई जरूरत नहीं है। और हक में जिसकी priority होगी उसको आएगा। अगर हम Policy Driven State इस पर जितना बल देंगे उतना interpretation के लिए किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं जाएगा। कानून खुद बोलता होगा नियम खुद बोलते होंगे, व्यवस्था स्वयं बोलती होगी। जिसके हक का होगा उसके हक का मिल जाएगा। और इसलिये हमारी कोशिश ये है कि हमारी सारी बातें नीति आधारित हो, Black & White में हो और उसके कारण किसी को भी इथर उधर करने का अवकास न रहे। अगर हम इन बातों कि ओर भी बल देते हैं। और कानून बनाते समय भी हम जितने ज्यादा लोगों के दिमागों का उपयोग करेंगे उतना कानून अच्छा बनता है। secrecy कोई matter नहीं करती है। वो तीस दिन चालीस दिन अगर मान लीजिए कानून पहले पता चल जाए कोई इससे बड़ा….हां बजट-वजट जैसे प्रावधान होते हैं, जिसमें संभालना पड़ता है। वरना मालदार कोई पहुंचा इंसान market में जाकर के अपनी दुनिया खड़ी कर ले। लेकिन जो चीजें सालों से चर्चा में है या तो किसी न किसी रूप में कानून में पड़ी हुई है लेकिन सुधार की आवश्यकता है। ये चीजें तो ऐसी है जिसमें समाज के सामान्य मानवी को जोड़ने से उसमें sharpness आती है, शुचिता आती है और ज्यादातर वो उपयोगी सिद्ध होती है और उसलिये दिशा में भी प्रयास करना चाहिए।
Technology के भरपूर उपयोग का मतलब ये नहीं कि सिर्फ AADHAR Card. हम मान लीजिये check-post होते हैं, अब GST की बात कर रहा है वो संकट में से निकल जाएंगे। देखिए जहां जहां पर check-post पर CCTV Camera Network है और functional है कभी कभार तो क्या होता है कि CCTV Camera Network तो लग जाता है। वो लगने में interest होता है। क्योंकि बिल बनता है। लेकिन फिर न चाहने में भी interest होता है। पहले लगाना बड़े चाव से ताकि काम हो जाए। फिर न चले ताकि काम चलता रहे। और उसका परिणाम क्या होता है। जहां functional check-post है, आपने देखा होगा उसकी income अच्छी होगी। जहां पर check-post है CCTV camera है सब है लेकिन functional नहीं है। आप अनुभव करेंगे कि उसकी और उसकी income में कई गुणा फर्क होता है जी। वही रोड होगा एक किनारे पर एक check-post है दूसरे किनारे पर दूसरा check-post है, जो vehicle वहां गया था वही vehicle यहां आया। लेकिन उसकी इनकम सौ रुपया है, इसकी इनकम पांच सौ रुपया। ये फर्क आता है। हम इन चीजों को कैसे ला सकते हैं। Technology का जितना ज्यादा उपयोग करेंगे Policy Drivenव्यवस्था वो करेंगे। हम शुचिता ला सकते हैं।
ये बात सही है कि कानून का डर ज्यादातर लोगों को नहीं रहा है। सरकार में भी कोई जानता है सस्पेंड हो जाएंगे तो भई क्या बात आधा तो आना ही आना है। 50% तो आना है। और बाद में..पहले Departmental Inquiry तो उसमें संभाल लेंगे, और Departmental Inquiry से निकल गए तो फिर वापस आ जाएंगे तो जो पुराना रुका हुआ वो भी मिल जाएगा। ऐसी व्यवस्थाओं को एक दूसरे के साथ connected बन गई है कि जिसके कारण जो ईमानदारी से लड़ाई लड़ रहा है, ईमानदारी से कुछ करना चाहता है, उसको अधिक तकलीफ होती है। वो व्यवस्था में हरेक के आंख में चुभता है। ये कहां यार हमारे Department में आ गया। उसको तो कुछ करना नहीं है और हमको जीने देता नहीं। ये मुसीबत आती है। और ऐसी मुसीबत भोगने वाले भी बहुत सारे सरकारी मुलाजिम हैं। उनको मुसीबत इसलिये नहीं कि वो बेईमान हैं। उनकी मुसीबत इसलिये की वो ईमानदार है। और तब सरकार का काम बनता है। ईमानदारों को सुरक्षा देना। ईमानदार को हक देना। और इस पर जितना हम बल देंगे और Transparency से। आप देखीए सामान्य मानवी बेईमान नहीं है। सामान्य सरकारी मुलाज़िम बेईमान नहीं है। बहुत बड़ा वर्ग है, जो ईमानदारी से जिन्दगी खपा रहा है। लेकिन कुछ लोग हैं जिसके कारण ये पूरा prescription ऐसा बना हुआ है। और सामान्य मानवी को भी लगता है हो सकता है मेरा काम इसलिए नहीं हुआ है क्योंकि मेरा हक नहीं था इसलिये नहीं हुआ। इधर मैंने किसी को पैसा नहीं दिया। कुछ लोग तो ऐसे रहते हैं। बाजार में थैला लेकर घूमते रहते हैं। अच्छा जी तुम्हारा interview आया है, पचास हजार रुपये में नौकरी हो जाएगी। और ऐसे ईमानदार होते हैं साहब नौकरी नहीं दिलवा पाए तो पचास हजार वापस दे देते हैं। अब सौ लोगों में से पांच लोग लेने हैं। तो कोई तो पांच होने ही होने हैं। उस पांच के तो पचास–पचास हजार रुपये उसको आ गए। बाकि 95 के वापस दे दिये। ईमानदारी का ठेका चालू रहता है जी। ऐसे कारोबारियों ने तबाही की हुई है।
और इसलिये कठिन कानून है मैं जानता हूं। लेकिन कोशिश करते रहना चाहिए। बहुत सी बातें ऐसी होंगी जो हमारे भी ध्यान में नहीं आती होंगी, यार कैसे हुआ होगा क्या काम करता होगा कभी पता नहीं चलता। लेकिन हम अगर हर level पर vigilant हैं। हर स्तर पर हम अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करने का प्रयास करते हैं। तो cumulative effect आज भी दुनिया में ईमानदार देश है, तो हिन्दुस्तान क्यों नहीं हो सकता। ये ठीक है कि अभी CVC अभी बता रहे थे पहले करीब सौ नम्बर के पास थे अब करीब 76 के पास आ गए हैं। Improvement हुआ है। लेकिन इतने Improvement के बावजूद भी, हमने संतोष नहीं मानना चाहिए। हमने और Improvement के लिए और अधिक सतर्कता की राह पर जाना होगा। और तब जाकर के हम अच्छे परिणाम दे सकते हैं।
ये सरकार का मकसद है ऐसी शक्तियों को बल देना, सरकार का मकसद है सामान्य नागरिकों और आप कभी सामान्य नागरिक को असुविधा होगी तो वो सहन करने को तैयार होता है। ये चिल्लाहट करने वाले कुछ ही लोग होते हैं जी। जिनके पैरों के नीचे पानी आता है वो भी हो हल्ला करते हैं। ताकि सामान्य मानवी अच्छी चीजों के साथ चलने के लिए तैयार होता है। हम उन सामान्य नागरिक की ओर देख कर के चलेंगे। तो अच्छाई को उभारने में हमें बहुत बड़ी ताकत मिलेगी। समाज का भी सहोयग मिलेगा। और समाज का साथ मिलेगा तो परिणाम भी अच्छे मिलेंगे।
मैं फिर एक बार जन भागीदारी के साथ सतर्कता के अभियान को आगे बढ़ाने के इस प्रयास का पूरी टीम को बधाई देता हूं उनका अभिनन्दन करता हूं। और मुझे विश्वास है कि सप्ताह भर का प्रयत्न लाखों लोगों को आपके साथ जोड़ने में काम आया है और अब आप तीन नहीं लाखों लोग आपके साथ जुड़ें हैं। और अच्छे परिणाम के लिए एक संभावना को जन्म दिया है। मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं बहुत – बहुत धन्यवाद।
Corruption is not something we can have in our system: PM @narendramodi
— PMO India (@PMOIndia) November 7, 2016
Technology has a major role to bring in transparency: PM @narendramodi
— PMO India (@PMOIndia) November 7, 2016
The state has to be policy driven. Things can't depend on the whims and fancies of individuals: PM @narendramodi
— PMO India (@PMOIndia) November 7, 2016
While making laws and policies it is essential to have a broad range of inputs: PM @narendramodi
— PMO India (@PMOIndia) November 7, 2016